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थाली की जूठन में बर्बाद हो रहा किसान का पसीना

थाली में छोड़ी गई जूठन केवल भोजन की बर्बादी नहीं है, बल्कि उसके साथ पानी, जमीन, बिजली, किसान का श्रम और परिवहन पर खर्च हुए संसाधन भी बेकार चले जाते हैं

Every Leftover Bite Wastes Water, Land and Labour


Published: 09:00am, 29 Sep 2026

थाली में छोड़ी गई जूठन केवल भोजन की बर्बादी नहीं है, बल्कि उसके साथ पानी, जमीन, बिजली, किसान का श्रम और परिवहन पर खर्च हुए संसाधन भी बेकार चले जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की Food Waste Index Report 2024 के अनुसार दुनिया में वर्ष 2022 में करीब 1.05 अरब टन भोजन बर्बाद हुआ, जिसमें लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा घरों से निकला।

घरेलू स्तर पर कुल मात्रा देखें तो चीन में लगभग 10.87 करोड़ टन, भारत में 7.82 करोड़ टन, पाकिस्तान में 3.08 करोड़ टन, नाइजीरिया में 2.48 करोड़ टन और अमेरिका में 2.47 करोड़ टन भोजन सालाना बर्बाद होने का अनुमान है। हालांकि यह कुल मात्रा है और इसे प्रति व्यक्ति बर्बादी की रैंकिंग नहीं माना जाना चाहिए। भारत में औसतन करीब 55 किलो प्रति व्यक्ति सालाना घरेलू भोजन बर्बाद होने का अनुमान है।

भोजन की बर्बादी का असर पर्यावरण पर भी पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार खाद्य हानि और बर्बादी वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में महत्वपूर्ण योगदान देती है और ऐसी कृषि भूमि भी बेकार इस्तेमाल होती है जिस पर पैदा हुआ भोजन अंततः खाया ही नहीं जाता।

सरकार को क्या करना चाहिए ?

सरकार को होटल, विवाह स्थल, कैंटीन और बड़े आयोजनों में बचने वाले सुरक्षित भोजन को फूड बैंक और गैर-लाभकारी संस्थाओं तक पहुंचाने की अनिवार्य व्यवस्था बनानी चाहिए। शहरों में अतिरिक्त भोजन के संग्रह के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म और हेल्पलाइन विकसित की जा सकती है। स्कूलों में भोजन बचाने की आदत को पाठ्यक्रम और जागरूकता अभियान से जोड़ा जाना चाहिए।

इसके साथ ही कोल्ड स्टोरेज, बेहतर परिवहन, वैज्ञानिक भंडारण और स्थानीय खाद्य प्रसंस्करण सुविधाओं को बढ़ाना जरूरी है। खाद्य प्रतिष्ठानों को नियमित रूप से अपने फूड-वेस्ट का रिकॉर्ड रखने तथा सुरक्षित अतिरिक्त भोजन दान करने पर प्रोत्साहन दिया जा सकता है।

संयुक्त राष्ट्र ने भी 29 सितंबर को खाद्य हानि और बर्बादी के प्रति जागरूकता का अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित किया है। लक्ष्य स्पष्ट है- भोजन बचाना केवल भूख मिटाने का उपाय नहीं, बल्कि पानी, ऊर्जा, जमीन और पर्यावरण बचाने की भी जरूरत है।

Jitendra