देश के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) में छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल के लिए विशेषज्ञों का अलग कैडर बनाने पर विचार किया जा रहा है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत परामर्शदाताओं, मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों के नियमित पद सृजित किए जा सकते हैं। इसका उद्देश्य संस्थानों में स्थायी और प्रभावी मानसिक स्वास्थ्य सहायता सुनिश्चित करना है।
छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं से बढ़ी चिंता
हाल के महीनों में आईआईटी परिसरों में छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं ने मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता को रेखांकित किया है। सितंबर में आईआईटी बॉम्बे और अगस्त में आईआईटी दिल्ली में छात्रों की मौत के बाद परिसर में उपलब्ध सहायता व्यवस्था को लेकर सवाल उठे। हालांकि, निदेशकों के अनुसार, विशेषज्ञों का अलग कैडर बनाने पर पिछले दो वर्षों से विचार किया जा रहा है।
23 आईआईटी में विशेषज्ञों की नियुक्ति पर जोर
देश में वर्तमान में 23 आईआईटी संचालित हैं, जिनमें प्रत्येक संस्थान में लगभग 3,000 से 18,000 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। मौजूदा परामर्श केंद्रों के बावजूद विशेषज्ञों की संख्या अपर्याप्त मानी जा रही है। नई व्यवस्था में नियमित नियुक्तियां, निर्धारित बजट और सेवाओं की गुणवत्ता का मूल्यांकन शामिल होगा। आईआईटी गांधीनगर प्रस्तावित ढांचा तैयार कर रहा है।
90 प्रतिशत शिक्षकों के पास उचित प्रशिक्षण नहीं
उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित राष्ट्रीय कार्यबल की अंतरिम रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 90 प्रतिशत शिक्षकों के पास विद्यार्थियों की मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने का उचित प्रशिक्षण नहीं था। अध्ययन में शामिल 31 केंद्रीय वित्तपोषित संस्थानों में से 18 में कम से कम एक मानसिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाता उपलब्ध था, जबकि केवल चार संस्थानों में शिक्षक मार्गदर्शन के लिए औपचारिक प्रशिक्षण की व्यवस्था थी।
मानसिक स्वास्थ्य सुधार के लिए नई पहल
आईआईटी रुड़की, खड़गपुर और गुवाहाटी जैसे संस्थान मानसिक स्वास्थ्य नीतियों, सामाजिक संवाद और विद्यार्थी सहयोग कार्यक्रमों पर काम कर रहे हैं। प्रस्तावित कैडर से विशेषज्ञों की उपलब्धता, प्रशिक्षण और संस्थागत सहायता को मजबूत बनाने की उम्मीद है।


