स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और लोकेशन ट्रैकिंग ऐप्स के बढ़ते उपयोग के साथ बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर अभिभावकों की चिंता लगातार बढ़ रही है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि जरूरत से ज्यादा डिजिटल निगरानी बच्चों के आत्मविश्वास, स्वतंत्र सोच और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। उनका मानना है कि बच्चों की सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट्रल फ्लोरिडा के शोधकर्ताओं द्वारा 18 से 25 वर्ष आयु वर्ग के 523 युवाओं पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि बचपन में जिन युवाओं की लगातार डिजिटल निगरानी की गई, उनमें 51% ने अधिक तनाव और 65% ने निर्णय लेने में कठिनाई महसूस की। शोध के अनुसार, अत्यधिक निगरानी बच्चों और युवाओं में आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और जोखिम का सही आकलन करने की क्षमता को भी प्रभावित करती है।
भारत में भी यह विषय तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है। TRAI के अनुसार, देश में 97 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं, जबकि भारत में इंटरनेट और डिजिटल सेवाओं के उपयोग और रुझानों का अध्ययन करने वाली IAMAI-Kantar के अनुसार यह संख्या 90 करोड़ के पार पहुंच चुकी है। बढ़ती डिजिटल पहुंच के साथ बच्चोंऔर युवाओं की ऑनलाइन मौजूदगी भी तेजी से बढ़ी है।
NCRB के Crime in India 2024 के अनुसार, देश में बच्चों के खिलाफ अपराध 5.9% बढ़कर 1.87 लाख से अधिक हो गए हैं, जबकि साइबर अपराधों में 17.9% की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं, बच्चों से जुड़े साइबर अपराधों के उपलब्ध त आंकड़ों (Crime in India 2022) के अनुसार, ऐसे मामलों की संख्या 2021 के 1,376 से बढ़कर 2022 में 1,823 हो गई, जो 32% की वृद्धि दर्शाती है। इनमें 1,171 मामले बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री , 158 मामले साइबर स्टॉकिंग/बुलिंग और 416 मामले अन्य साइबर अपराधों के थे।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल लोकेशन ट्रैकिंग या हर गतिविधि पर नजर रखने के बजाय बच्चों और युवाओं को डिजिटल सुरक्षा, साइबर फ्रॉड से बचाव, ऑनलाइन गोपनीयता, साइबर बुलिंग की पहचान, आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने और जिम्मेदार निर्णय लेने का प्रशिक्षण देना अधिक प्रभावी होगा। उनके अनुसार, संवाद, विश्वास, डिजिटल साक्षरता और संतुलित पैरेंटिंग ही बच्चों को सुरक्षित, आत्मनिर्भर और जिम्मेदार डिजिटल नागरिक बनाने का सबसे प्रभावी तरीका है।


