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सहकारिता क्षेत्र के लिए नए कानून की आवश्यकता, ग्रामीण विकास को दी जाए प्राथमिकता: नितिन गडकरी

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने सहकारी क्षेत्र की भूमिका को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पुनरुद्धार में अहम बताते हुए महाराष्ट्र सरकार से सहकारी कानूनों में समयानुसार बदलाव की अपील की। उन्होंने विनिर्माण, सेवा और कृषि क्षेत्रों के आर्थिक योगदान में असंतुलन पर चिंता जताते हुए सहकारिता आंदोलन के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव का गहन अध्ययन कराने की आवश्यकता पर बल दिया।

Published: 10:00am, 13 May 2025

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने सोमवार को महाराष्ट्र में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में सहकारिता क्षेत्र की मौजूदा चुनौतियों और संभावनाओं पर गंभीर चर्चा की। उन्होंने कहा कि बदलती आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप सहकारी प्रतिष्ठानों से जुड़े कानूनों में संशोधन जरूरी हो गया है, ताकि यह क्षेत्र ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक मजबूती में और अधिक प्रभावी योगदान दे सके।

गडकरी ने महाराष्ट्र सरकार को सुझाव दिया कि राज्य में सहकारी क्षेत्र के लिए नया कानून बनाया जाए, जो न केवल वर्तमान समस्याओं का समाधान दे, बल्कि भविष्य की आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखे। उन्होंने कहा कि सहकारी क्षेत्र ग्रामीण जनता की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, और खासकर डेयरी एवं खाद्यान्न प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा दे सकता है।

उन्होंने विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों के योगदान में असंतुलन का भी उल्लेख किया। गडकरी के अनुसार, विनिर्माण क्षेत्र का योगदान 22-24 प्रतिशत है, जबकि सेवा क्षेत्र 52-54 प्रतिशत योगदान के साथ जीएसटी का सबसे बड़ा स्त्रोत बन चुका है। इसके विपरीत, कृषि क्षेत्र जो 60 प्रतिशत आबादी को रोजगार देता है, उसका योगदान केवल 12 प्रतिशत है, जो एक बड़ी चिंता का विषय है।

गडकरी ने इस अवसर पर कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, नौकरियों और बुनियादी सुविधाओं की कमी के चलते करीब 30 प्रतिशत लोग शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री से आग्रह किया कि वे एक ऐसा संशोधित कानून लाएं जो सहकारिता अधिनियम और कंपनी अधिनियम के बीच संतुलन स्थापित करे।

उन्होंने ‘महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक’ से आग्रह किया कि राज्यभर में तहसील और जिला स्तर पर सहकारिता आंदोलन का सामाजिक-आर्थिक प्रभाव मापने हेतु विस्तृत अध्ययन किया जाए। इसमें रोजगार, प्रति व्यक्ति आय और वृद्धि दर जैसे पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए।

गडकरी ने यह भी कहा कि सरकार द्वारा कृषि मूल्य निर्धारण पर नियंत्रण अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के दौर में बहुत सीमित हो गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर हम बदलते समय के अनुरूप खुद को नहीं ढालते, तो प्रतिस्पर्धा में पीछे छूटने का खतरा है।

YuvaSahakar Desk