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‘जब तैरना नहीं आता तो नदी में क्यों कूदे ? नहीं मिलेगी बीमा राशि’, बीमा कंपनी के तर्क पर उपभोक्ता फोरम ने सुनाया ये फैसला

भोपाल उपभोक्ता फोरम ने एक साहसी युवक के परिजनों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बीमा कंपनी को 10 लाख रुपये बीमा राशि और अतिरिक्त मुआवजा देने का आदेश दिया। युवक ने नदी में डूबते बच्चे की जान बचाई थी, लेकिन बीमा कंपनी ने दावा यह कहकर खारिज किया कि मृतक को तैरना नहीं आता था।

Published: 09:00am, 31 May 2025

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में बीमा कंपनी के अमानवीय रवैये का मामला सामने आया है, जिसमें उपभोक्ता फोरम ने साहसिक कृत्य को सम्मान देते हुए मृतक के परिजनों को न्याय दिलाया है। यह मामला यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी से जुड़ा है, जिसने एक युवक द्वारा बच्चे की जान बचाने के दौरान मृत्यु पर बीमा दावा खारिज कर दिया था।

भोपाल उपभोक्ता फोरम ने इस मामले में बीमा कंपनी के दावे को खारिज करने के तर्क को अनुचित ठहराते हुए मृतक के परिजनों के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

दत्तु सोनवाने ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी से 10 लाख रुपये की व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा पॉलिसी ली थी और इसका प्रीमियम समय पर जमा किया था। वर्ष 2022 में, वह अपने परिवार के साथ नर्मदापुरम के आंवली घाट पर पिकनिक के लिए गए थे। वहां उन्होंने एक बच्चे को नदी में डूबते देखा और उसे बचाने के लिए नदी में कूद गए। बच्चे को बचाने में वह सफल रहे, लेकिन स्वयं की जान गंवा दी।

जब मृतक की पत्नी ने बीमा दावे का आवेदन किया, तो कंपनी ने यह तर्क देते हुए दावा खारिज कर दिया कि दत्तु को तैरना नहीं आता था, इसलिए वह नदी में क्यों कूदे। भोपाल उपभोक्ता फोरम ने इस तर्क को अमानवीय और अनुचित करार दिया। फोरम ने स्पष्ट किया कि दत्तु सोनवाने का कृत्य लापरवाही नहीं, बल्कि एक आपातकालीन और मानवीय प्रयास था। उन्होंने नदी में नहाने के लिए नहीं, बल्कि एक बच्चे की जान बचाने के लिए छलांग लगाई थी।

फोरम ने बीमा कंपनी को 10 लाख रुपये की बीमा राशि, दावा खारिज होने की तारीख से 9 प्रतिशत ब्याज के साथ, परिजनों को भुगतान करने का आदेश दिया। इसके अतिरिक्त, मानसिक पीड़ा के लिए 5,000 रुपये और मुकदमे के खर्च के लिए 3,000 रुपये का मुआवजा भी देने का निर्देश दिया गया। यह राशि दो महीने के भीतर भुगतान करनी होगी, अन्यथा परिवाद दायर होने की तारीख से 9 प्रतिशत ब्याज लागू होगा।

परिवादी की वकील रचना सिंह चौहान ने बताया कि बीमा कंपनी का यह तर्क कि तैरना नहीं आता तो नदी में नहीं कूदना चाहिए, न केवल अमानवीय है, बल्कि मानवीय मूल्यों के खिलाफ है। उपभोक्ता फोरम ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद परिवादी के पक्ष में फैसला सुनाया है। उन्होंने आयोग के निर्णय की सराहना करते हुए कहा कि यह फैसला न केवल न्याय की जीत है, बल्कि समाज में मानवता और साहस को सम्मान देने की दिशा में एक मजबूत संदेश है।

YuvaSahakar Desk