भारत में ग्रीन हाइड्रोजन स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन का महत्वपूर्ण आधार बनकर उभर रहा है। नवीकरणीय बिजली की मदद से पानी के इलेक्ट्रोलिसिस से तैयार ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग उर्वरक, पेट्रोलियम रिफाइनिंग, इस्पात, भारी परिवहन और शिपिंग जैसे उन क्षेत्रों में किया जा सकता है, जहां कार्बन उत्सर्जन कम करना कठिन है।
राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को जनवरी 2023 में 19,744 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ मंजूरी दी गई थी। मिशन का लक्ष्य वर्ष 2030 तक कम से कम 50 लाख मीट्रिक टन वार्षिक ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता विकसित करना है। निर्यात मांग बढ़ने पर यह क्षमता एक करोड़ मीट्रिक टन सालाना तक पहुंच सकती है।
मिशन के तहत 15 कंपनियों को सालाना 3,000 मेगावाट इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण क्षमता के लिए प्रोत्साहन दिया गया है। फरवरी 2026 तक करीब 8,000 टन सालाना ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता शुरू हो चुकी थी, जबकि 8.62 लाख टन वार्षिक उत्पादन क्षमता के लिए प्रोत्साहन आवंटित किए गए हैं।
इस तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ाने के लिए स्टील, भारी वाहनों और शिपिंग क्षेत्र में पायलट परियोजनाएं भी चलाई जा रही हैं। 12 परियोजनाओं के तहत 27 बसों और 43 ट्रकों सहित 70 हाइड्रोजन वाहनों तथा 16 हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग स्टेशनों की योजना है।
ग्रीन हाइड्रोजन मिशन से 2030 तक आठ लाख करोड़ रुपये से अधिक निवेश और छह लाख से ज्यादा रोजगार सृजित होने का अनुमान है। इसके साथ लगभग 50 मिलियन मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन सालाना कम करने की क्षमता भी बताई गई है। सरकार का उद्देश्य भारत को ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, उपयोग और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है।


