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बिहार में मखाना खेती: सांस्कृतिक धरोहर और जीविका पर जलवायु संकट

बिहार का मखाना केवल एक कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि मिथिला और सीमांचल क्षेत्रों की सांस्कृतिक पहचान और लाखों लोगों की आजीविका का आधार है। देश के कुल मखाना उत्पादन का लगभग 85% बिहार से आता है, जिसमें मधुबनी, दरभंगा, पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज जैसे जिले प्रमुख केंद्र हैं। बिहार में करीब 15,000 हेक्टेयर भूमि पर मखाना की खेती होती है, जिससे सालाना लगभग 10,000 टन पॉप्ड मखाना का उत्पादन होता है।

सहकारिता मंत्र ने लॉंच की ‘क्लाइमेट चेंज एंड मखाना फार्मर्स ऑफ बिहार' रिपोर्ट


Published: 12:54pm, 26 Jun 2025

बिहार में मखाना की खेती केवल एक पारंपरिक कृषि प्रणाली नहीं, बल्कि लाखों किसानों और ग्रामीण महिलाओं की आजीविका का स्रोत है। देश में कुल मखाना उत्पादन का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा बिहार से आता है। मिथिला और सीमांचल क्षेत्रों की संस्कृति से जुड़ा यह कृषि उत्पाद अब वैश्विक बाजार में भी अपनी पहचान बना रहा है। राज्य में वर्तमान में लगभग 15,000 हेक्टेयर भूमि पर मखाना की खेती की जा रही है और हर वर्ष लगभग 10,000 टन पॉप्ड मखाना का उत्पादन होता है।

हाल ही में बिहार के सहकारिता मंत्री श्री प्रेम कुमार ने ‘क्लाइमेट चेंज एंड मखाना फार्मर्स ऑफ बिहार’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें राज्य के मखाना किसानों की समस्याओं, अवसरों और सरकारी पहलों का विवरण दिया गया है। इस रिपोर्ट के अनुसार राज्य सरकार मखाना उत्पादन को बढ़ावा देने और इसे संगठित करने की दिशा में गंभीर प्रयास कर रही है। इसी कड़ी में मधुबनी और दरभंगा जिलों में 21 नई मखाना सहकारी समितियों का गठन किया गया है।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि बिहार में मखाना प्रोसेसिंग कार्यों में महिलाएं अहम भूमिका निभा रही हैं। मखाने की सफाई, ग्रेडिंग, सुखाने और रोस्टिंग जैसे कार्य पारंपरिक रूप से महिलाएं ही करती आ रही हैं। हालांकि, इसके बावजूद उन्हें उनके श्रम का उचित पारिश्रमिक और सुरक्षा नहीं मिल रही है।

जलवायु परिवर्तन बना बड़ी चुनौती

रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तर बिहार के तालाबों और चौरों में मखाना उत्पादन प्रभावित हो रहा है। बारिश के पैटर्न में आए बदलाव और पानी की कमी से पारंपरिक मखाना किसान संकट में हैं। तालाबों के प्रदूषित होने और ताजे पानी की उपलब्धता में कमी के कारण उत्पादन घट रहा है।

पारंपरिक किसानों को नहीं मिल रही सरकारी मदद

सर्वाधिक चिंता की बात यह है कि कोल, चाईं और वनपर समुदाय जैसे पारंपरिक किसान, जिनके पास अपनी भूमि नहीं है, उन्हें न तो सब्सिडी मिल रही है और न ही मखाना बीमा योजना का लाभ। जबकि सरकार की ओर से प्रति एकड़ ₹80,000 की सब्सिडी निर्धारित है। इसके अलावा बाजार में उचित मूल्य नहीं मिलने और मजदूरी दर बढ़ने से किसान दोहरी मार झेल रहे हैं।

समाधान और सिफारिशें

इस रिपोर्ट को सोशल इम्पैक्ट एडवायजर्स के मुन्ना झा और रीजनरेटिव बिहार के इश्तेयाक़ अहमद ने मिलकर तैयार किया है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि मखाना किसानों को मनरेगा, जल-जीवन-हरियाली मिशन, और अन्य सरकारी योजनाओं से जोड़ने की जरूरत है। साथ ही मखाना उत्पादन को स्थायी बनाने के लिए किसानों को सब्सिडी, बीमा और तकनीकी सहयोग दिया जाना चाहिए।

YuvaSahakar Desk