सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के करीब चार महीने बाद NCERT ने कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान (भाग-2) की संशोधित पाठ्यपुस्तक जारी कर दी है। नए संस्करण में न्यायपालिका से जुड़े कई विवादित अंश हटाए गए हैं, जबकि जनहित याचिका (PIL), संविधान के तहत सुप्रीम कोर्ट की भूमिका, न्यायाधिकरण और वैकल्पिक विवाद समाधान जैसे विषयों को विस्तार से शामिल किया गया है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल पहले जारी की गई पुस्तक में न्यायपालिका को लेकर की गई कुछ टिप्पणियों पर विवाद खड़ा हो गया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए पुस्तक के वितरण पर रोक लगा दी थी। इसके बाद संबंधित अध्याय की समीक्षा की गई और अब उसे पूरी तरह दोबारा लिखकर संशोधित संस्करण प्रकाशित किया गया है।
नई किताब में क्या–क्या बदला?
संशोधित पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित पूरा हिस्सा हटा दिया गया है। इसके अलावा अदालतों में लंबित मामलों, न्यायिक व्यवस्था की चुनौतियों, न्यायाधीशों की कमी, जटिल कानूनी प्रक्रियाओं और कमजोर आधारभूत ढांचे पर आधारित सामग्री भी अब पुस्तक का हिस्सा नहीं है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आधारित अलग सेक्शन को भी हटा दिया गया है।
अध्याय की शुरुआत में छात्रों के लिए दिए गए “बिग क्वेश्चन” में भी बदलाव किया गया है। पहले छात्रों से पूछा जाता था कि स्वतंत्र न्यायपालिका क्यों जरूरी है, जबकि अब प्रश्न किया गया है कि एक न्यायपूर्ण और सौहार्दपूर्ण समाज के लिए न्याय क्यों महत्वपूर्ण है।
किन चर्चित मामलों का जिक्र हटाया गया?
संशोधित संस्करण से पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई के उस बयान का उल्लेख भी हटा दिया गया है, जिसमें उन्होंने न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और कदाचार की घटनाओं का जिक्र किया था। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट के दो अहम फैसलों श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत संघ पर आधारित उदाहरण और कक्षा चर्चा भी पुस्तक से हटा दी गई है।
नई किताब में क्या जोड़ा गया?
संशोधित पुस्तक में संविधान के तहत सुप्रीम कोर्ट की भूमिका, जनहित याचिका (PIL), अनुच्छेद 32 और 226 के तहत उपलब्ध संवैधानिक प्रावधान, न्यायाधिकरण तथा वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) को विस्तार से शामिल किया गया है। पुस्तक में बताया गया है कि जनहित याचिका के माध्यम से सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों में न्याय सुनिश्चित किया जाता है।
उदाहरण के तौर पर हुसैनारा खातून मामला, एम.सी. मेहता के पर्यावरण संबंधी मामले और कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से जुड़े विशाखा फैसले का उल्लेख किया गया है।
पुस्तक निर्माण टीम में भी बदलाव
संशोधित संस्करण में पुस्तक निर्माण टीम की सूची में भी बदलाव किया गया है। पहले संस्करण में 51 सदस्य थे, जबकि नए संस्करण में यह संख्या घटकर 48 रह गई है। नई सूची में मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार के नाम शामिल नहीं हैं।
हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि पाठ्यपुस्तक का निर्माण एक सामूहिक प्रक्रिया थी और संबंधित विशेषज्ञों की न्यायपालिका की छवि खराब करने की कोई मंशा नहीं थी। इसके बाद अदालत ने अपने पहले के आदेश में संशोधन भी किया था।


