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सुप्रीम कोर्ट के आदेश से उत्तराखंड में सहकारी चुनाव का रास्ता साफ

प्रदेश की बहुउद्देशीय सहकारी समितियों में प्रबंध समिति के कुल 6350 पद हैं, जिनमें से 5893 पदों पर पहले ही चुनाव हो चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन चुनावों को वैध मानते हुए सिर्फ शेष 457 पदों पर ही पुनः चुनाव कराने के आदेश दिए हैं।

Published: 12:08pm, 17 Oct 2025

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उत्तराखंड में सहकारी समितियों के चुनाव की प्रक्रिया एक बार फिर शुरू होने जा रही है। राज्य सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण चुनावों की तैयारियों में जुट गया है। राज्य की कुल 670 सहकारी समितियों में से शेष 54 समितियों के लिए नया नोटिफिकेशन जल्द जारी किया जाएगा।

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा लगाई गई रोक को हटा दिया, जिसके बाद अब इन 54 समितियों के 457 रिक्त पदों के लिए जल्द ही नई अधिसूचना जारी की जाएगी। इसके साथ ही समिति स्तर के चुनाव पूर्ण होने के बाद जिला और राज्य स्तरीय सहकारी संघों के चुनाव भी आयोजित किए जाएंगे।

गौरतलब है कि राज्य सरकार ने सहकारी चुनावों में इस बार दो महत्वपूर्ण बदलाव किए थे: महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करना और ऐसे नए मतदाताओं को मतदान अधिकार देना जिन्होंने किसी प्रकार का आर्थिक लेनदेन नहीं किया था। इन संशोधनों को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिससे चुनाव प्रक्रिया पर रोक लग गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हाईकोर्ट की रोक हटाते हुए सहकारी समितियों के चुनाव पुनः शुरू करने का आदेश दिया है।

प्रदेश की कुल 672 सहकारी समितियों में से 92 प्रतिशत समितियों के चुनाव पहले ही संपन्न हो चुके हैं। हाईकोर्ट की रोक के चलते शेष समितियों के चुनाव स्थगित थे। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हाईकोर्ट की ओर से लगाई गई इस रोक को हटा दिया, जिससे अब लगभग डेढ़ लाख नए मतदाता भी चुनाव में भाग ले सकेंगे।

राज्य सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण के अध्यक्ष हंसा दत्त पांडे ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हीं समितियों के चुनाव कराए जाने का आदेश दिया है, जिनके चुनाव स्थगित हुए थे। इसके लिए प्राधिकरण शीघ्र ही नई अधिसूचना जारी करेगा।

सहकारिता विभाग के अनुसार, प्रदेश की बहुउद्देशीय सहकारी समितियों में प्रबंध समिति सदस्यों के 5893 पदों पर हुए चुनावों को सुप्रीम कोर्ट ने वैध ठहराया है। अब केवल 457 रिक्त पदों के लिए चुनाव कराए जाएंगे।

महिलाओं के लिए वर्तमान में 30 प्रतिशत आरक्षण प्रावधानित है, जिसे बढ़ाकर अधिक प्रभावी बनाने के लिए सरकार ने नियमावली की धारा 12 (ख) में छूट दी थी। इस प्रावधान के अंतर्गत तीन वर्षों से समिति के सदस्य रहे व्यक्तियों को, भले ही उन्होंने कोई लेनदेन न किया हो, मतदान का अधिकार देने का निर्णय लिया गया था।

YuvaSahakar Desk