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भारत का बाहरी कर्ज बढ़ा, रुपये और महंगाई पर पड़ सकता है दबाव

आरबीआई के अनुसार, विदेशी कर्ज के आंकड़ों पर डॉलर की मजबूती का भी असर पड़ा है

Published: 15:02pm, 30 Jun 2026

भारत का कुल विदेशी कर्ज मार्च 2026 के अंत तक बढ़कर 762.8 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, यह मार्च 2025 की तुलना में 26.3 अरब डॉलर अधिक है। इसके साथ ही विदेशी कर्ज का GDP से अनुपात भी बढ़कर 20.8% हो गया, जो एक साल पहले 19.8% था। यानी देश की अर्थव्यवस्था के आकार की तुलना में बाहरी कर्ज का बोझ पहले से कुछ अधिक हो गया है।

आरबीआई के अनुसार, विदेशी कर्ज के आंकड़ों पर डॉलर की मजबूती का भी असर पड़ा है। अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने से 24.6 अरब डॉलर का मूल्यांकन प्रभाव पड़ा। यदि इस प्रभाव को अलग कर दिया जाए, तो मार्च 2025 की तुलना में भारत का विदेशी कर्ज 26.3 अरब डॉलर के बजाय 51 अरब डॉलर बढ़ता। इसका मतलब है कि वास्तविक आधार पर बाहरी देनदारियों में बढ़ोतरी ज्यादा रही, लेकिन डॉलर की चाल के कारण अंतिम आंकड़ा कम दिखा।

विदेशी कर्ज की संरचना देखें तो मार्च 2026 के अंत तक भारत का दीर्घकालिक विदेशी कर्ज 613.5 अरब डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 11.6 अरब डॉलर अधिक है। वहीं, अल्पकालिक विदेशी कर्ज की हिस्सेदारी भी बढ़ी है। कुल विदेशी कर्ज में अल्पकालिक कर्ज का हिस्सा मार्च 2026 में बढ़कर 19.6%हो गया, जो मार्च 2025 में 18.3%था। विदेशी मुद्रा भंडार के मुकाबले अल्पकालिक कर्ज का अनुपात भी 20.1% से बढ़कर 21.6% हो गया। यह अहम संकेतक है, क्योंकि अल्पकालिक कर्ज जल्दी चुकाना पड़ता है और इसके लिए डॉलर की जरूरत अधिक होती है।

भारत के विदेशी कर्ज में सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिकी डॉलर में है। मार्च 2026 तक कुल विदेशी कर्ज में डॉलर मूल्य वर्ग की हिस्सेदारी 55.5% रही। इसके बाद भारतीय रुपये में 29.4%, येन में 6.4%, SDR में 4.3%और यूरो में 3.7%कर्ज दर्ज किया गया। कर्ज के प्रकार के आधार पर देखें तो कुल विदेशी कर्ज में ऋणों की हिस्सेदारी 34.7%, मुद्रा और जमा की 22.3%, व्यापार ऋण व अग्रिम की 19% और ऋण प्रतिभूतियों की 16.1% रही। आरबीआई के अनुसार, सरकारी विदेशी कर्ज में कमी आई है, जबकि गैर-सरकारी यानी कंपनियों, बैंकों और अन्य संस्थाओं का कर्ज बढ़ा है।

हालांकि, विदेशी कर्ज बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि हर नागरिक को सीधे यह पैसा चुकाना होगा। यह सरकार, निजी कंपनियों, बैंकों और अन्य संस्थाओं का कुल बाहरी कर्ज है। फिर भी इसका असर आम आदमी पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ सकता है। यदि विदेशी कर्ज और डॉलर की मांग बढ़ती है तो रुपये पर दबाव बन सकता है। रुपया कमजोर होने पर कच्चा तेल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक सामान, मोबाइल, लैपटॉप, मशीनरी और आयातित वस्तुएं महंगी हो सकती हैं। इसका असर पेट्रोल-डीजल, परिवहन लागत और महंगाई के रूप में आम लोगों तक पहुंच सकता है।

प्रति व्यक्ति औसत गणना के हिसाब से देखें तो यदि भारत की आबादी करीब 147.66 करोड़ मानी जाए, तो 762.8 अरब डॉलर का कुल विदेशी कर्ज प्रति व्यक्ति करीब 516.6 डॉलर बैठता है। यदि डॉलर-रुपया दर ₹93.09 प्रति डॉलर मानी जाए, तो यह रकम करीब ₹48,090 प्रति व्यक्ति होती है। चार सदस्यों के परिवार के हिसाब से यह गणितीय औसत करीब ₹1.92 लाख बैठता है। हालांकि यह नागरिकों पर सीधा भुगतान योग्य कर्ज नहीं है, बल्कि देश की कुल बाहरी देनदारियों का औसत अनुमान है।

दुनिया के स्तर पर भी कर्ज का दबाव ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF के अनुसार, 2024 में वैश्विक कर्ज करीब 251 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया और यह दुनिया की GDP के 235% से अधिक स्तर पर रहा। इसमें सार्वजनिक कर्ज करीब 99.2 ट्रिलियन डॉलर और निजी कर्ज करीब 151.8 ट्रिलियन डॉलर रहा। IMF के मुताबिक कई देशों में सरकारी कर्ज बढ़ा है, जबकि कुछ अर्थव्यवस्थाओं में निजी कर्ज घटा है। यानी भारत में विदेशी कर्ज की बढ़ोतरी को वैश्विक कर्ज दबाव और डॉलर की मजबूती के व्यापक संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

कुल मिलाकर, भारत का विदेशी कर्ज अभी GDP की तुलना में नियंत्रण से बाहर नहीं माना जा सकता, लेकिन कर्ज में बढ़ोतरी, अल्पकालिक कर्ज की हिस्सेदारी और डॉलर पर निर्भरता ऐसे संकेतक हैं, जिन पर नजर रखना जरूरी है। आम आदमी के लिए इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि उसे अलग से कोई कर्ज चुकाना होगा, लेकिन रुपये की चाल, आयातित वस्तुओं की कीमत, पेट्रोल-डीजल, महंगाई और सरकार की वित्तीय नीति के जरिए इसका असर रोजमर्रा के जीवन पर दिख सकता है।

YuvaSahakar Desk