ईरान और इजराइल के बीच जारी संघर्ष ने एक बार फिर पश्चिम एशिया को वैश्विक चिंता का केंद्र बना दिया । सबसे अधिक चिंता होरमुज़ जलडमरूमध्य को लेकर है, जहां से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और एलएनजी की आपूर्ति होती है। यदि इस समुद्री मार्ग पर बाधा आती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार, तेल की कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला पर व्यापक असर पड़ सकता है। अमेरिका हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए समझौता हुआ है, लेकिन होरमुज़ जलडमरूमध्य अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हो सका है। समुद्री सुरक्षा संबंधी जोखिम, बारूदी सुरंगों की मौजूदगी, जहाजों पर हमलों की घटनाएं और शिपिंग कंपनियों की सतर्कता के कारण इस मार्ग पर सामान्य आवाजाही अभी बहाल नहीं हुई है। ऐसे में भारत की ऊर्जा आयात में विविधीकरण की रणनीति और भी महत्वपूर्ण साबित हो रही है, क्योंकि इससे होरमुज़ पर निर्भरता पहले की तुलना में कम हुई है। हालांकि, भारत ने पिछले एक दशक में अपनी ऊर्जा और व्यापार नीति में जो बदलाव किए हैं, उनसे इस तरह के संकट का जोखिम पहले की तुलना में काफी कम हुआ है।
वर्ष 2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को रणनीतिक प्राथमिकता बनाया। सरकार ने किसी एक क्षेत्र या एक देश पर निर्भर रहने के बजाय ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण की नीति अपनाई। इसी रणनीति के तहत भारत ने मध्य-पूर्व के अलावा रूस, अमेरिका, अफ्रीका, ब्राजील और लैटिन अमेरिकी देशों से भी कच्चे तेल और गैस का आयात बढ़ाया। इसका उद्देश्य था कि किसी एक क्षेत्र में युद्ध, प्रतिबंध या आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में देश की ऊर्जा जरूरतें प्रभावित न हों।
इस नीति का असर व्यापारिक आंकड़ों में भी दिखाई देता है। वर्ष 2013 में भारत के कुल आयात का 31 प्रतिशत से अधिक हिस्सा मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ्रीकी देशों से आता था, जो 2024 तक घटकर करीब 21 प्रतिशत रह गया। इसी अवधि में इन देशों की भारत के कुल व्यापार में हिस्सेदारी 27 प्रतिशत से घटकर 19.8 प्रतिशत पर आ गई। वर्तमान में भी इस क्षेत्र के साथ भारत का लगभग 224 अरब डॉलर (करीब 19.26 लाख करोड़ रुपये) का व्यापार है, लेकिन भारत की निर्भरता पहले की तुलना में काफी कम हो चुकी है।
ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव और भी स्पष्ट है। एक दशक पहले भारत अपनी करीब 60 प्रतिशत ईंधन आवश्यकता मध्य-पूर्व से पूरी करता था, जो अब घटकर 43.8 प्रतिशत रह गई है। खाड़ी देशों की भारत के तेल आयात में हिस्सेदारी 21.4 प्रतिशत से घटकर 16.1 प्रतिशत हो गई है, जबकि ईरान, इजराइल, यूएई और अल्जीरिया जैसे देशों की संयुक्त हिस्सेदारी 21.8 प्रतिशत से घटकर 17.1 प्रतिशत रह गई है।
इस दौरान रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा, जबकि अमेरिका भारत के लिए क्रूड ऑयल, एलपीजी और एलएनजी का प्रमुख स्रोत बन गया। भारत-अमेरिका ऊर्जा साझेदारी पिछले कुछ वर्षों में तेजी से मजबूत हुई है। इससे भारत को ऊर्जा आयात के लिए अधिक विकल्प मिले और पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम हुई। साथ ही, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार के विस्तार, रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश ने भी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती दी।
भारत ने केवल आयात के स्रोत नहीं बदले, बल्कि व्यापार की प्रकृति भी बदली। पहले जहां इस क्षेत्र से मुख्य रूप से कच्चे तेल का आयात होता था, वहीं अब सोडा ऐश, फ्लाई ऐश, कोयला और अन्य खनिजों का आयात बढ़ा है। इन उत्पादों की हिस्सेदारी 2013 के 12.7 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 26.6 प्रतिशत हो गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव किसी एक देश की ओर झुकाव नहीं, बल्कि बहु-साझेदारी और आर्थिक-ऊर्जा विविधीकरण की नीति का परिणाम है। यही कारण है कि ईरान-इजराइल जैसे संघर्ष के बावजूद भारत आज पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित स्थिति में है। हालांकि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों और समुद्री परिवहन लागत पर असर पड़ता सकता फिर भी पिछले दस वर्षों में अपनाई गई रणनीति ने भारत को संभावित वैश्विक ऊर्जा संकटों का सामना करने के लिए पहले से कहीं अधिक सक्षम है।


