Supreme Court of India ने मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसाइटी (MSCS) के निवेश से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। अदालत ने कहा कि सहकारी संस्थाएं अपनी निधि का निवेश केवल उन्हीं संस्थाओं में कर सकती हैं जो उनके समान व्यवसायिक क्षेत्र (same line of business) से जुड़ी हों और यह निवेश उनके बायलॉज तथा लागू कानूनों के अनुरूप होना चाहिए।
यह टिप्पणी अदालत ने Nirmal Ujjawal Credit Co-operative Society Ltd. vs Ravi Sethia & Ors. मामले में अपील वापस लेने की अनुमति देते समय की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता ने अपील वापस लेने का अनुरोध किया है, जिसे स्वीकार किया जाता है। हालांकि मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने कानून की स्थिति स्पष्ट करना आवश्यक समझा।
मामला Multi-State Cooperative Societies Act, 2002 की धारा 64(d) की व्याख्या से जुड़ा था। इस प्रावधान के तहत किसी मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसाइटी को अपनी निधि को अपनी सहायक संस्था या उसी व्यवसायिक क्षेत्र में काम करने वाली किसी अन्य संस्था के शेयर, प्रतिभूतियों या परिसंपत्तियों में निवेश करने की अनुमति है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई सहकारी संस्था दिवाला प्रक्रिया में किसी कंपनी के लिए समाधान योजना प्रस्तुत करती है, तो उसे सभी लागू कानूनों का पालन करना होगा। इस संदर्भ में अदालत ने Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 की धारा 30(2)(e) का उल्लेख करते हुए कहा कि कोई भी समाधान योजना लागू कानूनों का उल्लंघन नहीं कर सकती।
अदालत ने स्पष्ट किया कि निवेश से पहले यह साबित करना जरूरी है कि जिस संस्था में निवेश किया जा रहा है वह या तो सहकारी संस्था की सहायक इकाई है या फिर उसी व्यवसायिक क्षेत्र में काम कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि “same line of business” शब्द की परिभाषा अधिनियम में नहीं दी गई है। हालांकि संसद की संयुक्त समिति की चर्चाओं से यह स्पष्ट होता है कि यह शब्द इसलिए जोड़ा गया था ताकि सहकारी संस्थाओं के फंड को असंबंधित या जोखिमपूर्ण क्षेत्रों में लगाने से रोका जा सके।
न्यायालय ने कहा कि सहकारी संस्था के व्यवसायिक क्षेत्र का निर्धारण मुख्य रूप से उसके बायलॉज से होता है। इसलिए किसी भी निवेश का निर्णय उसके बायलॉज में निर्धारित उद्देश्यों और गतिविधियों के अनुरूप होना चाहिए।
हालांकि अपील वापस लेने के कारण इस मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं दिया गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी सहकारी संस्थाओं के निवेश से जुड़े कानून की व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन मानी जा रही है।


