लेह। Looms of Ladakh Women Cooperative Limited ने लद्दाख की पारंपरिक पश्मीना और वस्त्र कला को संगठित आर्थिक गतिविधि से जोड़कर महिला कारीगरों के लिए बेहतर आजीविका का रास्ता बनाया है। करीब एक दशक में संस्था ने कारीगरों, पशुपालक समुदायों, उत्पादन केंद्रों और बाजारों को जोड़ने वाला नेटवर्क विकसित किया है।
इस पहल की शुरुआत 2013 में हुई और मई 2017 में सहकारी संस्था की स्थापना की गई। गुजरात के डेयरी सहकारी मॉडल से प्रेरित इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य महिला उत्पादकों को संस्था के स्वामित्व और निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में रखना है।
14 अक्टूबर 2026 की आमसभा में संस्था ने महिला उत्पादकों के स्वामित्व, लोकतांत्रिक निर्णय और महिला नेतृत्व के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। सहकारी मॉडल से कारीगरों को केवल रोजगार ही नहीं, बल्कि व्यवसायिक फैसलों में भागीदारी और बेहतर सौदेबाजी की ताकत भी मिल रही है।
लद्दाख में संस्था का Central Atelier और Head Office कारीगरों को डिजाइनरों, ब्रांडों और खरीदारों से सीधे जुड़ने का अवसर देता है। चांगथांग के चुशुल में NABARD की मदद से सौर ताप आधारित कार्यशाला भी विकसित की गई है। सहकारी संस्था ने उन्नत बुनाई, उत्पाद विकास और बारीक धागे के उत्पादन में भी निवेश किया है। इसकी फाइन-काउंट बुनाई क्षमता लगभग 400 मीटर प्रतिमाह बताई गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, कारीगरों की औसत मासिक आय करीब ₹3,000 से बढ़कर 2024 तक लगभग ₹15,000 पहुंची। यह मॉडल दिखाता है कि स्थानीय कौशल, सामूहिक स्वामित्व और बाजार तक बेहतर पहुंच के जरिए पारंपरिक कला को टिकाऊ व्यवसाय में बदला जा सकता है।


