वैश्विक जलवायु प्रणाली में एक बार फिर बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि वर्ष 2026 में प्रशांत महासागर में एक अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो (El Niño) विकसित होने वाला है, जिसे इसकी विनाशकारी क्षमता के कारण ‘गॉडजिला अल नीनो’ या ‘सुपर अल नीनो’ का नाम दिया गया है। यह मौसमी घटना न केवल भारत के मानसून चक्र को बाधित कर सकती है, बल्कि देश की आर्थिक स्थिरता के लिए भी बड़ा जोखिम पैदा कर सकती है।
अल नीनो क्या है और कैसे बनता है
अल नीनो प्रशांत महासागर में होने वाली एक जलवायु घटना है, जिसमें समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से लगभग 2 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है। यह एक प्राकृतिक जलवायु चक्र है, लेकिन जब यह अत्यधिक शक्तिशाली हो जाता है, तो इसे सुपर या मेगा अल नीनो कहा जाता है। इस स्थिति में वैश्विक मौसम प्रणाली प्रभावित होती है और कई क्षेत्रों में सूखा, तो कहीं अत्यधिक वर्षा जैसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं।
इस घटना की शुरुआत समुद्र की सतह के नीचे गर्म पानी के बड़े भंडार से होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह गर्मी कई सप्ताह या महीनों पहले जमा हो जाती है और धीरे-धीरे सतह पर प्रभाव दिखाने लगती है। जब दक्षिण अमेरिका के तट पर ठंडे, पोषक तत्वों से भरपूर पानी का ऊपर उठना (अपवेलिंग) कमजोर पड़ जाता है, तब गर्म पानी पूर्व की ओर फैलने लगता है, जिससे अल नीनो की स्थिति मजबूत होती जाती है।
समुद्र के भीतर बढ़ती गर्मी और संकेत
मौजूदा परिस्थितियों में मध्यरेखीय पूर्वी प्रशांत महासागर के भीतर असामान्य रूप से गर्म पानी का जमाव देखा जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्र की सतह के नीचे तेजी से बढ़ रही गर्मी एक बड़े और शक्तिशाली अल नीनो का स्पष्ट संकेत है।
जापान एजेंसी फॉर मरीन-अर्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिक स्वाधीन बेहेरा के अनुसार, वर्तमान स्थिति इतनी तेजी से विकसित हो रही है कि इसे “गॉडजिला अल नीनो” जैसी घटना माना जा सकता है। उनका कहना है कि यह 2015 के अल नीनो जैसी तीव्रता हासिल कर सकता है।
भारत में मानसून पर संभावित प्रभाव
भारत में अल नीनो का सीधा प्रभाव मानसून पर पडता है। ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023 में देश में सामान्य से लगभग 6 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई थी, जबकि वर्ष 2015 में 14 प्रतिशत की कमी के साथ यह पिछले 100 वर्षों में सबसे शुष्क वर्षों में से एक रहा।
हालांकि, यह भी ध्यान देने योग्य है कि हर अल नीनो सूखा नहीं लाता। वर्ष 1997 इसका उदाहरण है, जब मजबूत अल नीनो के बावजूद भारत में सामान्य मानसून दर्ज किया गया था। बावजूद इसके, मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए विशेषज्ञों ने इस वर्ष सामान्य से कम बारिश की आशंका जताई है।
बढ़ती गर्मी और मौजूदा स्थिति
भारत वर्तमान में भीषण गर्मी की चपेट में है। अप्रैल माह में ही तापमान कई क्षेत्रों में 43 से 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है, जो सामान्यतः मई-जून में देखने को मिलता है। वैश्विक स्तर पर भी भारत इस समय सबसे अधिक गर्म क्षेत्रों में शामिल है।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, समुद्र की सतह के तापमान में वृद्धि और वायुदाब में बदलाव के कारण यह स्थिति उत्पन्न हो रही है। ब्रिटेन के मौसम विभाग के वैज्ञानिक एडम स्केफ के अनुसार, ट्रॉपिकल प्रशांत महासागर में तापमान वृद्धि की गति इस सदी में अभूतपूर्व है।
अर्थव्यवस्था पर संभावित असर
अल नीनो की स्थिति भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती बन सकती है। भीषण गर्मी और कमजोर मानसून के कारण कृषि उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, ऊर्जा कीमतों में पहले से हो रही वृद्धि के बीच अब खाद्य महंगाई अर्थव्यवस्था के लिए एक नया जोखिम बनकर उभर सकती है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में महंगाई दर 5 प्रतिशत से अधिक हो सकती है, जो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 4.6 प्रतिशत के अनुमान से अधिक है।
बता दें कि पिछले 4 मानसून अच्छे रहे हैं, इससे भारत में अनाज उत्पादन अच्छा रहा है। इसका सकारात्मक असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है और देश की अर्थ व्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान भी काफी बढ़ा है। वही पिछले वर्ष मानसूनी वर्षा सामान्य से काफी अधिक रही थी।
प्रमुख आर्थिक चुनौतियां
देश में बढ़ती गर्मी के कारण बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। हाल ही में यह मांग 256 गीगावॉट तक दर्ज की गई, जो अब तक का उच्चतम स्तर है।
मानसून में संभावित कमी से खेती प्रभावित हो सकती है, क्योंकि भारत की अधिकांश कृषि वर्षा पर निर्भर है। इसके परिणामस्वरूप फसलों की पैदावार घट सकती है और खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि हो सकती है।
यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है, तो महंगाई दर 5.8 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति में RBI को ब्याज दरों में कटौती की योजना स्थगित करनी पड़ सकती है या दरों में वृद्धि भी करनी पड़ सकती है।
आम जनता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी लगभग 37 प्रतिशत है, जिससे खाद्य महंगाई का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ता है।
भारत की लगभग 60 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है और कृषि पर निर्भर है। खराब मानसून की स्थिति में किसानों की आय में कमी आएगी, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी और उपभोक्ता मांग में गिरावट आ सकती है।
इसके अलावा, कम वर्षा के कारण किसानों को सिंचाई के लिए डीजल पंपों का अधिक उपयोग करना पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पहले ही 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं, जिससे खेती की लागत में वृद्धि होना तय है।
संभावित राहत और संतुलन के कारक
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति पूरी तरह नकारात्मक नहीं होगी। भारत के पास चावल और गेहूं का पर्याप्त सरकारी भंडार उपलब्ध है, जो खाद्य कीमतों को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।
इसके अतिरिक्त, बेहतर सिंचाई व्यवस्था और जलवायु-प्रतिरोधी बीजों के उपयोग के कारण कृषि क्षेत्र अब पहले की तुलना में अधिक सक्षम हो गया है, जिससे अल नीनो के प्रभाव को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
वर्ष 2026 में संभावित “गॉडजिला अल नीनो” वैश्विक जलवायु और भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर सकता है। हालांकि, इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन आने वाले महीनों में वेस्टर्ली विंड बर्स्ट और समुद्री तापमान के विकास पर निर्भर करेगा।
सरकार, वैज्ञानिक संस्थान और नीति निर्माता इस स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं, ताकि संभावित जोखिमों का समय रहते आकलन कर उचित कदम उठाए जा सकें। आने वाले महीनों में मानसून की स्थिति इस पूरे परिदृश्य की दिशा तय करेगी, जो देश की कृषि, महंगाई और आर्थिक विकास पर सीधा प्रभाव डालेगी।


