सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि स्व-वित्तपोषित उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रोफेशनल कोर्स के दौरान सामान्यतः फीस नहीं बढ़ाई जा सकती। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने प्रवेश से पहले पूरे पाठ्यक्रम की फीस घोषित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
अदालत ने कहा कि कई परिवार अपनी आय, बचत और शिक्षा ऋण के सहारे बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाते हैं। अचानक फीस बढ़ने से उनकी आर्थिक योजना प्रभावित होती है। चार या पांच वर्ष के पाठ्यक्रम में दाखिला लेते समय छात्रों को कुल वित्तीय दायित्व स्पष्ट होना चाहिए। हालांकि, असाधारण आर्थिक परिस्थितियों, कानूनी बदलावों या अप्रत्याशित खर्च बढ़ने पर सीमित संशोधन संभव है। पीठ ने स्पष्ट किया कि यह अपवाद होगा, नियमित फीस निर्धारण और संस्थागत योजना का विकल्प नहीं।
मामला पश्चिम बंगाल के डॉ. बी.सी. रॉय इंजीनियरिंग कॉलेज के 2023–27 बीटेक बैच से जुड़ा है। राज्य सरकार ने 16 अक्टूबर 2023 को, दाखिले पूरे होने के बाद, सालाना ट्यूशन फीस की सामान्य सीमा 1.10 लाख रुपये निर्धारित की थी। इसके आधार पर कॉलेज ने दिसंबर में ट्यूशन फीस करीब 37.5 प्रतिशत बढ़ाई और विकास शुल्क जोड़ा। छात्रों ने इस बढ़ोतरी को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी।
अदालत ने राज्य सरकार और फीस निर्धारण समिति की देरी पर सवाल उठाए। उसने कहा कि समितियां प्रवेश प्रक्रिया शुरू होने से पहले खर्चों का आकलन कर फीस तय कराएं। संस्थानों की संसाधन आवश्यकताओं और छात्रों की आर्थिक सुरक्षा में संतुलन जरूरी है। हाईकोर्ट्स को समितियों का प्रभावी कामकाज सुनिश्चित करने को भी कहा गया।


