सहकार से समृद्धि के माध्यम से भारत को विकसित बनाने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए केंद्रीय सहकारिता मंत्रालय जो पहल कर रहा है उसमें प्रधानमंत्री की सलाहकार परिषद की भूमिका महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री के सहकारिता सलाहकार कमल कुमार त्रिपाठी सहकारिता क्षेत्र का भविष्य संवारने के लिए लगातार प्रयासरत हैं। सहकारिता मंत्रालय के गठन की ढांचागत संरचना तैयार करने में भी उनकी बड़ी भूमिका रही है। वह सहकारिता क्षेत्र को करीब से देखते और समझते रहे हैं। सहकारिता क्षेत्र की मजबूती के लिए उठाए कदमों का जमीन पर क्या असर दिख रहा है और आगे किस तरह की योजनाएं बनाई जाएंगी, सहित इस क्षेत्र के तमाम मुद्दों पर एसपी सिंह और अभिषेक राजा ने उनसे विस्तार से बातचीत की। पेश हैं उनके प्रमुख अंश:-
नया मंत्रालय बनने के बाद सहकारिता क्षेत्र की मजबूती के लिए जो पहल की गई है उसकी मौजूदा स्थिति क्या है?
मैं लंबे अरसे से सहकारिता को देखता और समझता रहा हूं और अब इस क्षेत्र के नीति निर्माण में शामिल हूं। देश में इस समय 8.54 लाख कोऑपरेटिव सोसायटी रजिस्टर्ड हैं जिनमें से 20 प्रतिशत क्रेडिट सोसायटी और बाकी नॉन-क्रेडिट सोसायटी हैं। अमूल, इफको, कृभको जैसी बड़ी कोऑपरेटिव दशकों से देश के कोऑपरेटिव सेक्टर को नेतृत्व प्रदान कर रही हैं। मंत्रालय गठन के बाद से ही यह प्रयास किया जा रहा है कि जो छूटे हुए क्षेत्र हैं या कमजोर क्षेत्र हैं उनमें कोऑपरेटिव को कैसे मजबूत किया जाए। क्रेडिट सोसायटी, जिनमें पैक्स, ग्रामीण सहकारी बैंक, शहरी सहकारी बैंक, जिला सहकारी बैंक और राज्य सहकारी बैंक आते हैं, उनमें एनपीए (गैर-निष्पादित संपत्तियां) की समस्या बहुत ज्यादा थी। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने इस समस्या के समाधान और पैक्स को आर्थिक रूप से व्यावहारिक बनाने के लिए नीति बनाने की जिम्मेदारी हम लोगों को सौंपी थी। इसके लिए जो कदम उठाए गए हैं उससे क्रेडिट कोऑपरेटिव के एनपीए पर काफी हद तक काबू पाया जा सका है।
पैक्स को मजबूत बनाने के लिए जो पहल की गई है उसका जमीनी स्तर पर कितना असर हुआ है?
जैसा कि सभी जानते हैं कि प्राथमिक सहकारी समिति (पैक्स) पहले केवल ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को छोटी अवधि के कर्ज देने, एग्रीकल्चर इनपुट मुहैया कराने और अनाजों की खरीद का काम करते थे। मंत्रालय के गठन के बाद पैक्स को आर्थिक रूप से व्यावहारिक बनाने के लिए मॉडल बायलॉज में संशोधन किया गया और उन्हें दो दर्जन से ज्यादा कारोबार करने की अनुमति दी गई। इस बायलॉज को 25 से ज्यादा राज्यों ने स्वीकार कर लागू कर दिया है। अब पैक्स कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) चला रहे हैं, जन औषधि केंद्र, किसान समृद्धि केंद्र, पेट्रोल पंप खोल रहे हैं, अनाज भंडारण योजना के तहत अनाजों के गोदाम और अनाज खरीद केंद्र आदि बना रहे हैं। इससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार देखा जा रहा है जिसका फायदा किसानों और ग्रामीण आबादी को भी मिलने लगा है और वे समृद्धि की ओर बढ़ रहे हैं।
राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 लागू होने के बाद इसका कोऑपरेटिव से जुड़े और आम लोगों को क्या फायदा होगा?
सहकार की भावना हमारे देश में नई नहीं है। इसका समावेशन हमारी संस्कृति में सदियों से है। वसुधैव कुटुम्बकम का जो भारत का नारा है वह सहकार का ही एक प्रतिबिंब है और सहकारिता इसका एक रूप है। राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 के छह स्तंभ हैं। इसमें युवाओं को सहकारिता से जोड़ने और सहकारिता के माध्यम से उनका भविष्य संवारने के उपाय किए गए हैं। इसके तहत यह प्रावधान किया गया है कि इस बात की संपूर्ण समीक्षा की जाए कि युवाओं को आगे बढ़ाने के क्या उपाय किए गए हैं, कोऑपरेटिव्स के लीडरशिप में उनकी कितनी भूमिका है, सहकारी संस्थाओं के निदेशक मंडल में किस तरह का व्यवहार किया जाता है, उनका गवर्नेंस कैसा है, जिम्मेदारी तय की जाती है या नहीं, राज्य स्तरीय या राष्ट्रीय स्तर की सहकारी संस्थाओं से पैक्स किस तरह से जुड़े हैं और उनका क्या और कितना योगदान है। इस तरह की समीक्षा नहीं की जाएगी तो यह क्षेत्र आगे नहीं बढ़ पाएगा।
भारत युवाओं का देश है। अगर कोऑपरेटिव्स युवाओं को आकर्षित नहीं कर पाएंगे तो नई नीति के जो छह स्तंभ हैं वे ढह जाएंगे। युवाओं को आकर्षित करने के लिए केवल कोऑपरेटिव्स को बढ़ावा नहीं देना है, बल्कि कोऑपरेटिव एजुकेशन और ट्रेनिंग के माध्यम से कैसे युवाओं का भविष्य संवारा जा सकता है इसे भी देखना पड़ेगा और उन्हें यह भी बताना पड़ेगा कि कोऑपरेटिव्स उनके लिए कैसे लाभदायक हैं।
कोऑपरेटिव एजुकेशन को बढ़ावा देने के लिए त्रिभुवन सहकारी यूनिवर्सिटी की स्थापना की गई है। पहले से भी कुछ एजुकेशन और ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट देश में मौजूद हैं। क्या ये कोऑपरेटिव सेक्टर की कुशल पेशेवरों की जरूरतों को पूरी करने में सक्षम हैं?
आपने बहुत सही सवाल पूछा है। यह कोऑपरेटिव सेक्टर के लिए बहुत नाजुक समय है। ईमानदारी से कहूं, तो आज युवाओं में सहकार की भावना तो है लेकिन वे सहकारिता क्षेत्र से दूर चले गए हैं। उनको सहकारी सिद्धांतों के माध्यम से इस क्षेत्र में लाना पड़ेगा। इसके लिए उन्हें समझाना और जागरूक करना होगा कि आखिर यह है क्या और इस क्षेत्र में वे अपना करियर कैसे बना सकते हैं। एजुकेशन और ट्रेनिंग के माध्यम से ही इस क्षेत्र के लिए ज्यादा से ज्यादा कुशल पेशेवरों को तैयार किया जा सकता है। सहकारिता राज्य का विषय है। राज्यों को भी इसे बढ़ावा देने के लिए काफी सुधार और मेहनत करने की जरूरत है। उदाहरण के तौर पर देखें तो कई राज्यों में नया कोऑपरेटिव्स बनाने के लिए मेंबर्स की संख्या 50 तक होना जरूरी है। जम्मू-कश्मीर में तो 100 सदस्यों की अनिवार्यता है। इसी तरह, ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की सुविधा सभी राज्यों में नहीं है। इस तरह के कई प्रावधानों में राज्य स्तर पर बदलाव की जरूरत है। एजुकेशन एवं ट्रेनिंग और मानव संसाधन के लिए नीति बनाने, टेक्नोलॉजी को अपनाने जैसे उन्हें उपाय करने होंगे।


