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बनारसी लौंगलता और नाव कला को GI टैग, वैश्विक मंच पर काशी के 34 उत्पादों की चमक

“वाराणसी वैश्विक मंच पर अपनी सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करने जा रहा है। बनारसी लौंगलता मिठाई और नाव शिल्प को जीआई टैग की सूची में शामिल करने की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई है। अब काशी के नाम 34 जीआई उत्पादों का अनूठा गौरव होगा, जिससे सांस्कृतिक विरासत को संरक्षण और वैश्विक पहचान मिलेगी।

Published: 13:04pm, 22 Sep 2025

वाराणसी, जिसे काशी और बनारस के नाम से भी जाना जाता है, अपनी प्राचीन संस्कृति, परंपराओं और कलात्मक धरोहर के लिए विश्व प्रसिद्ध है। अब यह शहर एक नई उपलब्धि हासिल करने जा रहा है। बनारसी लौंगलता मिठाई और पारंपरिक नाव शिल्प को जीआई (भौगोलिक संकेतक) टैग की सूची में शामिल किया जा रहा है। इस उपलब्धि के साथ वाराणसी दुनिया का पहला ऐसा शहर बन जाएगा, जिसके पास 34 जीआई टैग उत्पाद होंगे। वर्तमान में वाराणसी के 32 उत्पाद पहले ही जीआई टैग की मान्यता प्राप्त कर चुके हैं।

जीआई विशेषज्ञ डॉ. रजनीकांत ने जानकारी दी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 75वें जन्मदिवस पर उनके संसदीय क्षेत्र से जीआई टैग के लिए 75वां आवेदन गुजरात के सोमपुरा स्टोन क्राफ्ट के लिए किया गया। इसी क्रम में बनारस की पारंपरिक नाव शिल्पकला और लोकप्रिय लौंगलता मिठाई को भी आवेदन सूची में जोड़ा गया है।

इस सूची में देशभर के अन्य राज्यों के उत्पाद भी शामिल हैं, जिनमें मिर्जापुर की बजरी, रामकेड़ा आम, सूरत डायमंड, पानीपत खेस टेक्सटाइल, त्रिपुरा चकमा वस्त्र, हिमाचल वुड कार्विंग, नागालैंड मौलम पाइनएप्पल, मिजोरम दारजो चाय, जयपुरी रजाई और मेघालय बांस क्राफ्ट शामिल हैं।

डॉ. रजनीकांत ने बताया कि इस ऐतिहासिक उपलब्धि को हासिल करने में नाबार्ड, वस्त्र मंत्रालय, एमएसएमई मंत्रालय, डोनर मंत्रालय और भारत सरकार के कई विभागों का अहम योगदान रहा है। किसी एक संस्था द्वारा एक वर्ष में 75 जीआई आवेदन किया जाना अपने आप में एक अनोखी उपलब्धि है।

यह पहल न केवल काशी की पारंपरिक कलाओं और मिठाइयों को कानूनी संरक्षण प्रदान करेगी, बल्कि इन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने में भी मदद करेगी। इसके माध्यम से स्थानीय कारीगरों और उद्यमियों को रोजगार और वैश्विक बाजार तक पहुंच का अवसर प्राप्त होगा।

क्या है GI टैग ?

भौगोलिक संकेतक (GI) टैग एक ऐसा कानूनी उपकरण है जो किसी उत्पाद की विशिष्ट भौगोलिक उत्पत्ति, गुणवत्ता तथा प्रतिष्ठा को सुरक्षित करता है। भारत में जीआई टैग अधिनियम, 1999 के अंतर्गत यह व्यवस्था कार्यान्वित है, जो विश्व व्यापार संगठन (WTO) के TRIPS समझौते से अनुप्राणित है। जीआई टैग के लाभ बहुमुखी हैं: यह नकली उत्पादों से सुरक्षा प्रदान करता है, कारीगरों की आय में वृद्धि करता है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाता है तथा सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखता है। उदाहरणस्वरूप, वाराणसी के पूर्व जीआई टैग वाले उत्पादों जैसे बनारसी साड़ी, गुलाबी मीनाकारी, लकड़ी की नक्काशी, जर्दोजी, धातु कास्टिंग क्राफ्ट, म्यूरल पेंटिंग, तबला, शहनाई, थंडाई, तिरंगी बर्फी, लाल पेड़ा तथा अन्य ने स्थानीय कारीगरों को वैश्विक बाजार में पहचान दिलाई है।

YuvaSahakar Desk