अमेरिका की बदलती वीजा नीति और H-1B नियमों में बढ़ती सख्ती का असर अब वैश्विक प्रतिभाओं की आवाजाही पर दिखाई देने लगा है। भारतीय पेशेवर अमेरिका में H-1B के सबसे बड़े लाभार्थी हैं, इसलिए नीतिगत बदलाव का असर उन पर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। वित्त वर्ष 2025 में अमेरिका ने 4,06,348 H-1B petitions मंजूर कीं। इनमें 2,83,772 यानी 69.9% भारतीय मूल के पेशेवरों की थीं। चीन 49,161 approvals यानी 12.1% के साथ दूसरे स्थान पर रहा।
अमेरिका की वैज्ञानिक प्रतिभा पाइपलाइन में भी बदलाव के संकेत हैं। American Institute of Physics के अनुसार अमेरिकी संस्थानों से Physics PhD करने वाले गैर-अमेरिकी नागरिकों में डिग्री के बाद देश छोड़ने वालों की हिस्सेदारी 2023-24 के 16% से बढ़कर 2024-25 में 29% हो गई। यह करीब तीन दशक में सबसे ऊंचा स्तर है।
Institute of International Education के सर्वे में करीब 60% अमेरिकी उच्च शिक्षण संस्थानों ने अंतरराष्ट्रीय छात्रों के आवेदनों में गिरावट बताई। वहीं वित्त वर्ष के शुरुआती नौ महीनों में certified H-1B applications भी पिछले साल की समान अवधि से करीब 10% कम रहीं।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका का विज्ञान और तकनीक क्षेत्र विदेशी प्रतिभाओं पर काफी निर्भर है। National Science Foundation के अनुसार 2023 में अमेरिकी STEM workforce का 22% विदेशी मूल का था। Science and Engineering occupations में मास्टर्स डिग्री वाले कर्मचारियों में विदेशी मूल की हिस्सेदारी 39% और डॉक्टरेट स्तर पर 46% रही।
सितंबर 2026 में ट्रंप प्रशासन ने कुछ नए H-1B petitions के लिए $100,000 भुगतान की व्यवस्था को सितंबर 2027 तक बढ़ाया है । इसके बीच जर्मनी, ब्रिटेन और भारत जैसे विकल्प भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं के लिए अधिक महत्वपूर्ण होते दिख रहे हैं।


