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वन-उत्पाद आधारित सहकारी समितियों से मिली जनजातीय अर्थव्यवस्था को नई मजबूती

सरकार झारखंड और गुजरात सहित देश के जनजातीय क्षेत्रों में लघु वन उत्पाद, हस्तशिल्प, जैविक उत्पाद और अन्य स्थानीय आजीविका गतिविधियों से जुड़ी सहकारी संस्थाओं को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे रही है।

Published: 14:51pm, 06 Aug 2026

सरकार झारखंड और गुजरात सहित देश के जनजातीय क्षेत्रों में लघु वन उत्पाद, हस्तशिल्प, जैविक उत्पाद और अन्य स्थानीय आजीविका गतिविधियों से जुड़ी सहकारी संस्थाओं को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे रही है। इसका उद्देश्य वन क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय परिवारों को बेहतर बाजार, उचित मूल्य, प्रसंस्करण सुविधाएं और स्थायी आय के अवसर उपलब्ध कराना है।

राष्ट्रीय सहकारिता नीति, 2025 में कमजोर और सीमांत समुदायों की सहकारी समितियों को सशक्त बनाने के साथ-साथ लघु वन उत्पादों के संग्रहण, मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और विपणन को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मौजूदा वन-उत्पाद सहकारी समितियों को मजबूत करने तथा स्थानीय आर्थिक संभावनाओं के अनुसार उन्हें बहुउद्देशीय सहकारी समितियों के रूप में विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

सरकार राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस की सहायता से उन जिलों और क्षेत्रों की पहचान भी कर रही है, जहां सहकारी संस्थाओं की पहुंच अभी सीमित है। इससे जिला स्तर पर योजनाएं तैयार करने और जनजातीय क्षेत्रों में सहकारी नेटवर्क के विस्तार में मदद मिलेगी।

वन धन कार्यक्रम से स्थानीय उत्पादों को बाजार

भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास महासंघ यानी ट्राइफेड वनवासी जनजातीय आबादी वाले जिलों में वन धन कार्यक्रम का संचालन कर रहा है। इसके तहत लघु वन उत्पादों के संग्रहण, प्रसंस्करण और बिक्री के लिए जनजातीय समुदाय के स्वामित्व वाले वन धन विकास केंद्र क्लस्टर स्थापित किए जाते हैं।

इन केंद्रों में स्वयं सहायता समूहों और वन धन समूहों को संगठित कर स्थानीय स्तर पर उपलब्ध महुआ, इमली, लाख, शहद, औषधीय पौधे, बांस, गोंद और अन्य वन उत्पादों का मूल्य संवर्धन किया जाता है। सरकार इन समूहों को वन धन केंद्रों के रूप में विकसित करने के लिए 100 प्रतिशत सहायता प्रदान करती है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य जनजातीय परिवारों को केवल कच्चा माल बेचने तक सीमित रखने के बजाय उन्हें प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विपणन से जोड़ना है। इससे उत्पादों का बाजार मूल्य बढ़ने के साथ समुदायों की आय में भी सुधार हो सकता है।

झारखंड और गुजरात में वित्तीय सहायता

राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम विभिन्न सहकारी क्षेत्रों में पात्र संस्थाओं को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, संबंधित अवधि में निगम ने झारखंड में 44.40 करोड़ रुपये और गुजरात में 2,302.22 करोड़ रुपये का संवितरण किया है।

यह सहायता लागू योजनाओं के दिशा-निर्देशों और परियोजना प्रस्तावों की स्वीकृति के आधार पर दी जाती है। इसका उपयोग सहकारी संस्थाओं की कार्यशील पूंजी, भंडारण, प्रसंस्करण, विपणन, बुनियादी ढांचे और अन्य गतिविधियों को विकसित करने में किया जा सकता है।

गुजरात में झारखंड की तुलना में वित्तीय संवितरण काफी अधिक रहा है। हालांकि यह राशि केवल वन-उत्पाद आधारित सहकारी समितियों तक सीमित नहीं, बल्कि विभिन्न सहकारी क्षेत्रों के समग्र कार्यक्रमों से संबंधित है।

जनजातीय परिवारों की आय बढ़ाने की रणनीति

सरकार ने जनजातीय परिवारों को सहकारी व्यवस्था से जोड़कर उनकी आय बढ़ाने के लिए कई उपाय निर्धारित किए हैं। इनमें स्थानीय वन उपज और अन्य उत्पादों का एकत्रीकरण, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग और विपणन प्रमुख हैं।

सहकारी समितियों को बहुउद्देशीय गतिविधियां शुरू करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। ये समितियां कॉमन सर्विस सेंटर, कृषि और पशुपालन से जुड़ी निविष्टि आपूर्ति, भंडारण, प्रसंस्करण तथा अन्य ग्रामीण सेवाएं प्रदान कर सकती हैं। इससे जनजातीय समुदायों को आवश्यक सेवाएं स्थानीय स्तर पर मिल सकेंगी और सहकारी समितियों के लिए आय के नए स्रोत विकसित होंगे।

जैविक उत्पादों और निर्यात के लिए राष्ट्रीय मंच

जनजातीय क्षेत्रों के उत्पादों को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने के लिए राष्ट्रीय स्तर की सहकारी संस्थाओं की भूमिका भी बढ़ाई जा रही है।

नेशनल कोऑपरेटिव एक्सपोर्ट्स लिमिटेड (NCEL) सहकारी समितियों के अधिशेष उत्पादों के निर्यात के लिए संस्थागत मंच उपलब्ध कराता है। इसके माध्यम से जनजातीय क्षेत्रों में कार्यरत सहकारी संस्थाओं को भी अपने उत्पाद विदेशी बाजारों तक पहुंचाने का अवसर मिल सकता है।

इसी तरह, नेशनल कोऑपरेटिव ऑर्गेनिक्स लिमिटेड (NCOL) जैविक उत्पादों के एकत्रीकरण, प्रमाणीकरण, ब्रांडिंग और विपणन में सहयोग देता है। इसके तहत उत्पादों को “भारत ऑर्गेनिक्स” ब्रांड से बाजार में उतारने की व्यवस्था की गई है। इससे जनजातीय क्षेत्रों में उत्पादित शहद, मसाले, औषधीय उत्पाद, अनाज और अन्य जैविक वस्तुओं को बेहतर पहचान और मूल्य मिलने की संभावना है।

डिजिटलीकरण और पारदर्शिता पर जोर

प्राथमिक कृषि ऋण समितियों के कंप्यूटरीकरण और डिजिटलीकरण के माध्यम से पारदर्शिता, परिचालन दक्षता और सेवाओं तक पहुंच में सुधार किया जा रहा है। डिजिटल व्यवस्था से रिकॉर्ड प्रबंधन, वित्तीय लेनदेन, सदस्यता विवरण और बाजार संपर्क को बेहतर बनाया जा सकता है।

इसके साथ ही संशोधित बहु-राज्य सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के अनुसार बहु-राज्य सहकारी समितियों के बोर्ड में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य सहकारी संस्थाओं के निर्णय लेने वाले निकायों में सामाजिक भागीदारी बढ़ाना है।

कुल मिलाकर, वन-उत्पाद आधारित सहकारी समितियों को मजबूत करने की यह पहल जनजातीय समुदायों को स्थानीय संसाधनों पर आधारित स्थायी आजीविका से जोड़ सकती है। बेहतर प्रसंस्करण, ब्रांडिंग, वित्तीय सहायता, डिजिटल व्यवस्था और बाजार संपर्क के माध्यम से जनजातीय उत्पादकों की आय बढ़ाने तथा बिचौलियों पर निर्भरता कम करने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

Jitendra