भारत के खाद्य परिदृश्य में एक नए अध्याय की शुरुआत करते हुए केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री चिराग पासवान ने देश के खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) और न्यूट्रास्यूटिकल (Nutraceutical) क्षेत्रों के लिए एक सुस्पष्ट और समयबद्ध रोडमैप तैयार करने की आवश्यकता को रेखांकित किया है। नई दिल्ली में आयोजित ASSOCHAM के राष्ट्रीय सम्मेलन “न्यूट्रीभारत 2026: पोषण सुरक्षा को मजबूत करने में न्यूट्रास्यूटिकल्स और फंक्शनल फूड्स की भूमिका” को संबोधित करते हुए चिराग पासवान ने कहा कि वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के स्वप्न को साकार करने के लिए स्वास्थ्य और पोषण को आधार बनाना अनिवार्य है।
समयबद्ध लक्ष्य और नीतिगत समन्वय
चिराग पासवान ने उद्योग जगत के दिग्गजों, नीति निर्माताओं और नियामकों से संवाद करते हुए कहा कि इस क्षेत्र की वास्तविक क्षमता का दोहन करने के लिए अगले एक वर्ष, पांच वर्ष और दस वर्ष के विशिष्ट लक्ष्य निर्धारित करने होंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि केवल चर्चाओं से परिवर्तन नहीं आएगा, बल्कि इसके लिए ठोस रणनीति और प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है। पासवान ने कहा, “भारत ने खाद्य कमी के दौर से निकलकर खाद्य सुरक्षा (Food Security) के लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त कर लिया है। अब हमारा अगला और अधिक महत्वपूर्ण पड़ाव ‘पोषण सुरक्षा’ (Nutrition Security) है, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां कुपोषण से मुक्त और शारीरिक रूप से समर्थ हों।”
वैश्विक साख और गुणवत्ता के प्रति प्रतिबद्धता
अपने संबोधन में मंत्री ने गुणवत्ता के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति अपनाने की कड़ी चेतावनी दी। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मानकों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वैश्विक बंदरगाहों पर यदि भारत का एक भी कंसाइनमेंट खारिज होता है, तो यह केवल एक कंपनी का नुकसान नहीं है, बल्कि दशकों के परिश्रम से बनी देश की साख पर प्रहार है। उन्होंने उद्योग जगत से आह्वान किया कि नवाचार और जिम्मेदार उत्पादन को अपनी कार्यशैली का हिस्सा बनाएं ताकि “मेड इन इंडिया” उत्पाद दुनिया भर में भरोसे का प्रतीक बनें।
ग्लोबल फूड बास्केट बनने की ओर अग्रसर भारत
चिराग पासवान ने विश्वास व्यक्त किया कि भारत के पास एक विशाल कृषि आधार, निरंतर बढ़ती प्रोसेसिंग क्षमता और मजबूत वैश्विक व्यापारिक संबंध हैं, जो इसे दुनिया की ‘ग्लोबल फूड बास्केट’ बनाने की सामर्थ्य रखते हैं। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यह गौरव तभी प्राप्त होगा जब उद्योग, नियामक और शोध संस्थान एक साझा पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर काम करेंगे।
विशेषज्ञों का दृष्टिकोण और उद्योग की भूमिका
सम्मेलन के दौरान ASSOCHAM के अध्यक्ष निर्मल के. मिंडा ने सूक्ष्म पोषक तत्वों (Micronutrients) की कमी और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों को आधुनिक भारत की सबसे बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने ‘न्यूट्रीभारत’ जैसे मंचों को ठोस परिणाम देने वाले तंत्र के रूप में विकसित करने की वकालत की। वहीं, FAO के भारत प्रतिनिधि ताकायुकी हागीवारा ने वैश्विक परिप्रेक्ष्य साझा करते हुए कहा कि न्यूट्रास्यूटिकल्स आधुनिक आहार और आवश्यक पोषण के बीच की खाई को पाटने का सबसे प्रभावी साधन हैं।
LT Foods के CEO विवेक चंद्रा और Hexagon Nutrition के प्रबंध निदेशक विक्रम केलकर ने भी इस बात पर सहमति जताई कि भारत न्यूट्रास्यूटिकल्स और फंक्शनल फूड्स के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की दहलीज पर खड़ा है। उन्होंने आयुर्वेद जैसी पारंपरिक विरासत को वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ जोड़कर वैश्विक बाजार पर कब्जा करने की रणनीति पेश की।
नियामक ढांचा और ‘फार्म टू फॉर्मुलेशन’ विजन
FSSAI की सलाहकार डॉ. अलका राव ने नियामक स्पष्टता पर जानकारी देते हुए बताया कि प्रोबायोटिक्स और फंक्शनल फूड्स जैसे उभरते क्षेत्रों के लिए विज्ञान-आधारित मानक तैयार किए जा रहे हैं। सम्मेलन का एक प्रमुख आकर्षण EY के सहयोग से जारी नॉलेज पेपर ‘न्यूट्रीभारत@2047’ रहा। EY इंडिया के पार्टनर अमित वात्स्यायन ने ‘फार्म टू फॉर्मुलेशन’ (Farm to Formulation) वैल्यू चेन का प्रस्ताव रखा, जिसमें भारत की जैव विविधता को उच्च-मूल्य वाले पोषण उत्पादों में बदलने की क्षमता है।
यह सम्मेलन इस निष्कर्ष के साथ समाप्त हुआ कि भारत का पोषण परिवर्तन केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि एक जन-आंदोलन बनना चाहिए, जिसमें उद्योग की गुणवत्ता, विज्ञान का नवाचार और सरकार की नीतिगत दूरदर्शिता का समावेश हो।


