भारत के यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) ने संचालन के दस वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस दौरान यह दुनिया का सबसे बड़ा रियल टाइम पेमेंट प्लेटफॉर्म बनकर उभरा है और भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बना है।
नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की निगरानी में 11 अप्रैल 2016 को यूपीआई की शुरुआत की थी। वित्त वर्ष 2016-17 में इसके जरिए केवल 2 करोड़ लेनदेन हुए थे, जो वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 24,162 करोड़ हो गए। इस तरह लेनदेन की संख्या में करीब 12,000 गुना वृद्धि दर्ज की गई।
लेनदेन का कुल मूल्य भी 0.07 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 314 लाख करोड़ रुपये हो गया। देश के डिजिटल भुगतानों में यूपीआई की हिस्सेदारी करीब 85 प्रतिशत है, जबकि वर्ष 2025 में वैश्विक रियल टाइम भुगतान की कुल मात्रा में इसकी हिस्सेदारी 49 प्रतिशत रही।
शुरुआत के समय यूपीआई से केवल 21 बैंक जुड़े थे, जबकि अब इनकी संख्या बढ़कर 703 हो गई है। वर्तमान में यह प्लेटफॉर्म प्रतिदिन औसतन 66 करोड़ लेनदेन करता है, जिनका कुल मूल्य करीब 86,000 करोड़ रुपये है।
मार्च 2026 में यूपीआई के जरिए रिकॉर्ड 2,264 करोड़ लेनदेन हुए, जिनका कुल मूल्य 29.53 लाख करोड़ रुपये रहा। अब यूपीआई को आठ देशों में स्वीकार किया जा रहा है।
कुल लेनदेन में व्यापारी भुगतान की हिस्सेदारी 63 प्रतिशत है। यह रोजमर्रा की खरीदारी और वित्तीय समावेशन में यूपीआई की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने यूपीआई को लेनदेन की मात्रा के आधार पर दुनिया की सबसे बड़ी रियल टाइम भुगतान प्रणाली के रूप में मान्यता दी है।


