अमेरिका के बड़े कॉलेजों में इन दिनों एक नया और अनोखा ट्रेंड तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। आर्थिक रूप से संपन्न परिवार हॉस्टल या कैंपस में रहने वाले अपने बच्चों की देखभाल के लिए स्थानीय महिलाओं की सेवाएं ले रहे हैं। इन्हें अनौपचारिक रूप से ‘कैंपस मॉम’ या ‘किराये की मां’ कहा जा रहा है।
माइंडीनोज, बामा मामा और कैंपस मॉम जैसी कंपनियां कॉलेज छात्रों के लिए अलग-अलग पैकेज दे रही हैं। इन सेवाओं का सालाना खर्च करीब 525 डॉलर से 1,600 डॉलर तक है। भारतीय मुद्रा में यह लगभग 50 हजार रुपये से 1.5 लाख रुपये तक बैठता है।
इन सेवाओं के तहत स्थानीय महिलाएं जरूरत पड़ने पर छात्रों के कपड़े धुलवाने, कमरे की सफाई कराने, दवाइयां पहुंचाने और डॉक्टर या अस्पताल तक साथ जाने का काम करती हैं। जन्मदिन पर कमरे की सजावट, कुकीज या आइसक्रीम भेजने जैसी सुविधाएं भी इसमें शामिल हैं। कई मामलों में यदि छात्र लंबे समय तक घर फोन नहीं करता तो ये महिलाएं उसके कमरे तक जाकर स्थिति की जानकारी माता-पिता को देती हैं।
वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी से शुरू हुई ऐसी सेवाएं अब UCLA, नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा सहित कई बड़े कॉलेज परिसरों तक पहुंच चुकी हैं।
हालांकि इस ट्रेंड को लेकर विशेषज्ञ चिंता भी जता रहे हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया की समाजशास्त्री डॉ. एनेट लारेउ का मानना है कि जरूरत से ज्यादा देखभाल छात्रों में आत्मनिर्भरता विकसित होने से रोक सकती है। वहीं प्रोफेसर लैरी नेल्सन के अनुसार कपड़े धोने और सफाई जैसे बुनियादी काम भी दूसरों से करवाना युवाओं के व्यावहारिक विकास को प्रभावित कर सकता है।
सेवा देने वाली कंपनियों का कहना है कि यह केवल सुविधा नहीं बल्कि दूर रहने वाले माता-पिता को भावनात्मक भरोसा देने का भी एक जरिया बन गया है।


