भारतीय रिजर्व बैंक ने शहरी सहकारी बैंकों के लिए प्राथमिकता क्षेत्र ऋण का अलग और समेकित नियामकीय ढांचा प्रस्तावित किया है। हालांकि, इसमें मौजूदा 60 प्रतिशत के कुल प्राथमिकता क्षेत्र ऋण लक्ष्य में कोई बदलाव नहीं किया गया है और प्रमुख उप-लक्ष्य भी पहले जैसे ही रखे गए हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक ने गुरुवार को ‘भारतीय रिजर्व बैंक (शहरी सहकारी बैंक – प्राथमिकता क्षेत्र ऋण – लक्ष्य और वर्गीकरण) निर्देश, 2026’ का मसौदा जारी किया। इस पर हितधारकों से 26 नवंबर 2026 तक सुझाव मांगे गए हैं।
प्रस्ताव के अनुसार, शहरी सहकारी बैंकों के लिए प्राथमिकता क्षेत्र ऋण का कुल लक्ष्य समायोजित शुद्ध बैंक ऋण या तुलनपत्र से बाहर के जोखिमों के ऋण समतुल्य, जो भी अधिक हो, उसका 60 प्रतिशत रहेगा। सूक्ष्म उद्यमों के लिए 7.5 प्रतिशत और कमजोर वर्गों के लिए 12 प्रतिशत का उप-लक्ष्य भी बरकरार रखा गया है।
नए मसौदे में कृषि, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम, निर्यात, शिक्षा, आवास, सामाजिक अवसंरचना, नवीकरणीय ऊर्जा और अन्य पात्र क्षेत्रों से जुड़े प्रावधानों को एक ही नियम-पुस्तिका में समाहित किया गया है। इसमें प्राथमिकता क्षेत्र ऋण प्रमाणपत्र, तिमाही निगरानी, लक्ष्य में कमी, आगे ऋण देने की व्यवस्था और अनुपालन से जुड़े नियम भी शामिल हैं।
लक्ष्य पूरा नहीं करने वाले बैंकों को भारतीय रिजर्व बैंक के निर्देश पर नाबार्ड, राष्ट्रीय आवास बैंक, सिडबी या मुद्रा से जुड़े निर्धारित कोष में योगदान करना पड़ सकता है। प्राथमिकता क्षेत्र ऋण लक्ष्य पूरा न करने का असर नियामकीय मंजूरियों पर भी पड़ सकता है।
अंतिम दिशा-निर्देश लागू होने के बाद शहरी सहकारी बैंकों पर लागू पुराने प्राथमिकता क्षेत्र ऋण प्रावधान निरस्त कर दिए जाएंगे। यह ढांचा वेतनभोगी कर्मचारियों के बैंकों को छोड़कर सभी शहरी सहकारी बैंकों पर लागू होगा।


