बिहार की कभी समृद्ध रही चीनी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने सोमवार को नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता सहकारी चीनी क्षेत्र को सशक्त बनाने और गन्ना उत्पादक प्रमुख जिलों में ग्रामीण औद्योगिक गतिविधियों को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक नई नीति पहल माना जा रहा है।
प्रस्तावित योजना के तहत मधुबनी और दरभंगा जिलों में नई सहकारी चीनी मिलों की स्थापना की जाएगी, जो ऐतिहासिक रूप से गन्ना उत्पादन के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। पहले चरण में व्यवहार्यता अध्ययन और विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) तैयार किए जाएंगे, ताकि वित्तीय स्थिरता, तकनीकी आवश्यकताओं और दीर्घकालिक संचालन क्षमता का आकलन किया जा सके। इस पहल को पूर्व में बंद हो चुकी मिलों की विफलताओं से सीख लेते हुए एक सुनियोजित प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
यह पुनर्जीवन योजना गन्ना किसानों के लिए राहत लेकर आ सकती है, जो वर्षों से स्थानीय मिलों के बंद होने के कारण संकट झेल रहे हैं। निकटवर्ती खरीद केंद्रों और संगठित क्रशिंग सुविधाओं की उपलब्धता से किसानों को समय पर और उचित मूल्य मिलने की संभावना बढ़ेगी। परिवहन लागत में कमी और छोटी आपूर्ति श्रृंखला से किसानों की आय में सुधार होगा तथा ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे।
एक समय बिहार में 30 से अधिक चीनी मिलें संचालित थीं और राज्य देश के प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में गिना जाता था। हालांकि पिछले तीन दशकों में यह उद्योग लगातार गिरावट का शिकार हुआ। दरभंगा, मुजफ्फरपुर, वैशाली, नवादा, मधुबनी, सारण, पूर्वी चंपारण, सिवान और समस्तीपुर समेत कई जिलों की मिलें बंद हो गईं। अधिकांश इकाइयां 1990 के दशक में बंद हुईं, जबकि कुछ 2000 के दशक तक संघर्ष करती रहीं।
राष्ट्रीयकरण के बाद कई मिलों को बिहार राज्य चीनी निगम के अधीन लाया गया, लेकिन बढ़ते वित्तीय दबाव के कारण वे अलाभकारी होती गईं। पुरानी मशीनरी, कम शुगर रिकवरी दर और तकनीकी उन्नयन की कमी के कारण बिहार की मिलें उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की आधुनिक इकाइयों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकीं। प्रबंधन संबंधी चुनौतियां और आधुनिकीकरण में देरी ने स्थिति को और जटिल बना दिया।
किसानों को गन्ना भुगतान में देरी की शिकायतें आम रहीं, जिससे कई क्षेत्रों में गन्ना उत्पादन क्षेत्र घट गया। उत्तरी बिहार में बार-बार आने वाली बाढ़, अनियमित मौसम और कमजोर अवसंरचना ने आपूर्ति श्रृंखला को बाधित किया। मिलों के बंद होने के बाद परिसर जर्जर हो गए, मशीनें बेकार पड़ी रहीं और कुशल श्रमिक रोजगार की तलाश में पलायन कर गए, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा।
हालांकि पूर्व में पुनर्जीवन पैकेज और लीज योजनाओं की घोषणाएं की गईं, लेकिन ठोस प्रगति सीमित रही। ऐसे में राष्ट्रीय सहकारी चीनी मिल महासंघ के साथ नया एमओयू एक नई शुरुआत के संकेत देता है। सहकारी मॉडल, वित्तीय सतर्कता और किसान-केंद्रित नीतियों के माध्यम से राज्य सरकार बिहार के चीनी उद्योग में विश्वास बहाल कर उसे फिर से ग्रामीण विकास का प्रमुख आधार बनाने की दिशा में प्रयासरत है।


