IIT रोपड़ ने PhD स्टूडेंट्स के लिए प्रोडक्ट/स्टार्टअप-ड्रिवन PhD’ पाथवे शुरू किया है। इस मॉडल में रिसर्च स्कॉलर्स को केवल लंबी थीसिस और रिसर्च पेपर पर निर्भर रहने के बजाय अपने शोध को उपयोगी प्रोडक्ट, पेटेंट या स्टार्टअप में बदलने का अवसर मिलेगा। IIT रोपड़ इस तरह का मॉडल अपनाने वाला देश का पहला IIT बताया गया है।
नए मॉडल का उद्देश्य रिसर्च को उद्योग और समाज की वास्तविक समस्याओं से जोड़ना है। स्कॉलर किसी औद्योगिक चुनौती का समाधान विकसित कर सकता है, प्रोडक्ट तैयार कर सकता है या उससे जुड़ा बिजनेस मॉडल खड़ा कर सकता है। उसके काम का व्यावहारिक प्रभाव और व्यावसायिक उपयोग भी PhD मूल्यांकन का अहम आधार बन सकता है।
उदाहरण के तौर पर दवा और फूड सप्लाई चेन में तापमान में बदलाव, उत्पाद खराब होने और नकली सामान की समस्या को IoT सेंसर तथा ब्लॉकचेन जैसी तकनीकों से हल किया जा सकता है। इस तरह के व्यावहारिक समाधान नए PhD मॉडल के केंद्र में होंगे।
IIT रोपड़ के शिक्षकों के अनुसार पारंपरिक व्यवस्था में रिसर्च पेपर प्रकाशित करने और लंबी थीसिस तैयार करने का दबाव स्कॉलर्स के लिए चुनौती बन सकता है। नया मॉडल उन्हें इनोवेशन, पेटेंट और उद्यमिता की ओर प्रेरित करेगा।
इसी तरह का उद्योग-केंद्रित मॉडल BITS पिलानी में भी चल रहा है। चीन में फरवरी 2026 में एक सिविल इंजीनियरिंग स्कॉलर को व्यावहारिक डिजाइन आधारित शोध के लिए विशेष परिस्थितियों में PhD दिए जाने का मामला सामने आया था। भारत में PhD सामान्यतः न्यूनतम तीन और अधिकतम छह वर्ष की अवधि में पूरी की जाती है।


