संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खास तौर पर युवाओं और सिविल सेवा अभ्यर्थियों को संबोधित किया। उनका मुख्य संदेश था कि सिविल सेवा को केवल सुरक्षित और प्रतिष्ठित नौकरी के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र और नागरिकों की सेवा के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने कहा कि भर्ती व्यवस्था का उद्देश्य केवल यह जानना नहीं होना चाहिए कि उम्मीदवार कितना पढ़ा-लिखा है या कितना ज्ञान रखता है। यह भी महत्वपूर्ण है कि वह सिविल सेवा में क्यों आना चाहता है और सार्वजनिक जिम्मेदारी को किस भावना से निभाना चाहता है।
युवाओं के लिए उन्होंने दो स्पष्ट सिद्धांत रखे- राष्ट्र प्रथम और नागरिक प्रथम। यानी प्रशासनिक सेवा में आने वाले अधिकारी हर निर्णय में देशहित और नागरिकों की जरूरतों को प्राथमिकता दें।
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि आज चयनित होने वाले युवा अधिकारी आने वाले वर्षों में विकसित भारत के निर्माण में अहम भूमिका निभाएंगे। इसलिए सिविल सेवा की तैयारी केवल परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। अभ्यर्थियों में संवेदनशीलता, जिम्मेदारी, ईमानदारी, नेतृत्व क्षमता और समाज को समझने की दृष्टि भी विकसित होनी चाहिए।
अपने संबोधन में उन्होंने सरदार वल्लभ भाई पटेल की भूमिका का उल्लेख करते हुए मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था को राष्ट्र निर्माण से जोड़ा। साथ ही सुभाष चंद्र बोस की सिविल सेवा परीक्षा से जुड़ी ऐतिहासिक घटना का जिक्र कर युवाओं को यह संदेश दिया कि प्रतियोगी परीक्षाओं और प्रशासनिक व्यवस्था की परंपरा लगातार बदलती और विकसित होती रही है।
यूपीएससी का शताब्दी समारोह इस लिहाज से युवाओं के लिए केवल इतिहास का अवसर नहीं, बल्कि भविष्य की सार्वजनिक सेवा का रोडमैप भी बनकर सामने आया।


