सोशल मीडिया बच्चों और किशोरों के नजरिये को तेजी से प्रभावित कर रहा है। भारत में भी मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अब बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। इंस्टाग्राम, यूट्यूब, गेमिंग और शॉर्ट वीडियो के जरिए बच्चे लगातार ऐसी सामग्री देख रहे हैं, जिसका असर उनकी सोच, व्यवहार, पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों का दिमाग अभी पूरी तरह विकसित नहीं होता, इसलिए वे सोशल मीडिया पर दिखने वाली बातों को जल्दी सच मान लेते हैं। लाइक, शेयर, फॉलोअर्स और वायरल ट्रेंड की होड़ उनमें तुलना, दबाव और हीनभावना पैदा कर सकती है। कई बच्चे ऑनलाइन दिखावे, गलत जीवनशैली और खतरनाक चैलेंज से भी प्रभावित हो जाते हैं।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की बात कही है। भारत के नजरिये से भी यह विषय बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां बच्चों और किशोरों में स्मार्टफोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। ऐसे में सरकार, स्कूलों और अभिभावकों को मिलकर डिजिटल सुरक्षा पर गंभीर कदम उठाने की जरूरत है।
भारत में बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम तय करना, स्कूलों में डिजिटल जागरूकता बढ़ाना और अभिभावकों द्वारा ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखना जरूरी है। सोशल मीडिया पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन बच्चों के लिए इसका सुरक्षित, सीमित और जिम्मेदार इस्तेमाल ही बेहतर भविष्य के लिए जरूरी है।


