दिल्ली-एनसीआर में भीषण गर्मी का दौर जारी है और मॉनसून अब भी राजधानी से दूर है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार पाकिस्तान से आने वाली शुष्क हवाओं और बंगाल की खाड़ी से नमी वाली पूर्वी हवाओं के समय पर दिल्ली तक नहीं पहुंच पाने के कारण मॉनसून की बारिश में देरी हो रही है। हालांकि मौसम की परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो 3 या 4 जुलाई के आसपास मॉनसून दिल्ली-एनसीआर में दस्तक दे सकता है।
इस बीच भारत मौसम विभाग (IMD) ने बुधवार को दिल्ली-एनसीआर के लिए आंधी और बारिश का येलो अलर्ट जारी किया है। मौसम विभाग के अनुसार कुछ इलाकों में तेज हवाओं के साथ हल्की से मध्यम बारिश होने की संभावना है, जिससे लोगों को भीषण गर्मी से कुछ राहत मिल सकती है।
जून में 2014 के बाद सबसे कम बारिश
दिल्ली में मॉनसून की देरी का असर केवल राजधानी तक सीमित नहीं है। इस वर्ष जून में देशभर में करीब 99.5 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो 2014 के बाद जून महीने की सबसे कम वर्षा है। जबकि जून में सामान्य वर्षा 165.3 मिमी मानी जाती है। यानी इस बार जून में देशभर में सामान्य से करीब 40 प्रतिशत कम बारिश हुई।
मौसम विभाग के अनुसार 1 से 29 जून के बीच देश के 741 जिलों में से लगभग 70 प्रतिशत जिलों में सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कमी के पीछे अल नीनो का प्रभाव प्रमुख कारण रहा है।
पिछले लगभग 125 वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो जून में सबसे कम बारिश 2009 में 87.5 मिमी दर्ज की गई थी, जबकि अल नीनो प्रभाव वाले वर्ष 2014 में 92.1 मिमी बारिश हुई थी।
कई राज्यों में सामान्य से काफी कम वर्षा
क्षेत्रवार आंकड़ों के अनुसार, 1 से 20 जून के दौरान मध्य भारत में सामान्य से 50 प्रतिशत, पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 40 प्रतिशत, उत्तर-पश्चिम भारत में 31 प्रतिशत तथा दक्षिण भारत में 27 प्रतिशत कम बारिश हुई।
राज्यों की बात करें तो गुजरात में 82 प्रतिशत, मेघालय में 74 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 65 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई, जिससे कृषि और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ने लगा है।
खरीफ की बुआई पर भी पड़ा असर
मानसून की धीमी रफ्तार का असर कृषि क्षेत्र पर भी साफ दिखाई दे रहा है। 25 जून तक देश में खरीफ फसलों की बुआई 182.72 लाख हेक्टेयर में हुई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 236.46 लाख हेक्टेयर था। यानी इस बार बुआई में करीब 23 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
धान, दलहन, तिलहन, मोटे अनाज और कपास सहित सभी प्रमुख खरीफ फसलों की बुआई पिछले वर्ष की तुलना में पीछे चल रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जुलाई के पहले सप्ताह में मॉनसून रफ्तार नहीं पकड़ता है, तो इसका असर कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर भी पड़ सकता है।


