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मानसून 2026: स्काईमेट ने जताया ‘सामान्य से कम’ बारिश का अनुमान, किसानों की बढ़ी मुश्किलें

'अल नीनो' के सक्रिय होने से जुलाई से सितंबर के बीच बारिश में भारी कमी आ सकती है, जिससे देश के उत्तर-पश्चिमी राज्यों में सूखे का खतरा और खरीफ फसलों के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।

Published: 16:06pm, 07 Apr 2026

खरीफ फसलों की बुआई शुरू होने से पहले ही किसानों और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों की चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है। निजी मौसम पूर्वानुमान एजेंसी Skymet Weather ने वर्ष 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून का पहला पूर्वानुमान जारी करते हुए इसे सामान्य से कम रहने की संभावना जताई है। एजेंसी के अनुसार, इस बार मानसून पर प्रशांत महासागर की बदलती जलवायु परिस्थितियों का असर पड़ सकता है, जिससे वर्षा का वितरण असमान रहने की आशंका है।

अल नीनो का प्रभाव और वैज्ञानिक विश्लेषण स्काईमेट के प्रबंध निदेशक जतिन सिंह द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 18 महीनों से प्रभावी रही ‘ला नीना’ (La Niña) की स्थितियां अब समाप्त हो रही हैं। वर्तमान में प्रशांत महासागर ‘ईएनएसओ-न्यूट्रल’ (ENSO-Neutral) की अवस्था की ओर अग्रसर है। हालांकि, सबसे बड़ी चिंता मानसून के शुरुआती चरण में ही ‘अल नीनो’ (El Niño) के विकसित होने की प्रबल संभावना को लेकर है।

वैज्ञानिक दृष्टि से अल नीनो एक ऐसी समुद्री घटना है जिसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का सतही जल असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। ऐतिहासिक रूप से, जब भी अल नीनो सक्रिय होता है, भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापारिक पवनें कमजोर पड़ जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप मानसून की बारिश अनियमित और कम हो जाती है। वैश्विक वित्तीय संस्था ‘जेफरीज’ की एक हालिया रिपोर्ट भी स्काईमेट के दावों का समर्थन करती है, जिसमें इस वर्ष अल नीनो के मजबूत होने की 60 प्रतिशत संभावना जताई गई है।

महीनेवार वर्षा का खाका: जून में राहत, सितंबर में आफत स्काईमेट ने मानसून के चारों महीनों (जून से सितंबर) के लिए जो सांख्यिकीय अनुमान पेश किया है, वह खेती के महत्वपूर्ण चरणों के लिए चुनौतीपूर्ण नजर आ रहा है:

  • जून (LPA का 101%): मानसून का आगाज संतोषजनक रहने की उम्मीद है। शुरुआती बारिश सामान्य रहेगी, जिससे बुवाई के शुरुआती कार्यों में मदद मिलेगी।
  • जुलाई (LPA का 95%): मध्य मानसून में गिरावट शुरू होगी। जुलाई, जो खरीफ की मुख्य बुवाई का समय होता है, वहां बारिश में कमी किसानों की चिंता बढ़ा सकती है।
  • अगस्त (LPA का 92%): अगस्त के दौरान मानसून और कमजोर पड़ेगा। यह फसलों की वृद्धि के लिए सबसे संवेदनशील समय होता है।
  • सितंबर (LPA का 89%): सीजन का अंतिम महीना सबसे खराब रहने का अनुमान है। केवल 89 प्रतिशत वर्षा का अर्थ है कि मानसून की विदाई बहुत सूखी रह सकती है।

हिंद महासागर और क्षेत्रीय प्रभाव मौसम विज्ञानियों के अनुसार, हिंद महासागर डिपोल (IOD) इस वर्ष ‘न्यूट्रल’ रहने वाला है। यद्यपि एक सकारात्मक IOD अक्सर अल नीनो के प्रभाव को कम करने में सहायक होता है, लेकिन न्यूट्रल स्थिति के कारण यह अल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को रोकने में विफल रहेगा।

क्षेत्रीय आधार पर देखें तो पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे प्रमुख उत्पादक राज्य सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। इन राज्यों में अगस्त और सितंबर के दौरान बारिश की भारी कमी से धान, बाजरा और दलहन की पैदावार पर संकट मंडरा सकता है। इसके विपरीत, पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत में तुलनात्मक रूप से बेहतर वर्षा की उम्मीद है, हालांकि वहां भी बारिश का वितरण असमान रहने की संभावना है।

अर्थव्यवस्था और महंगाई पर संभावित प्रभाव

भारत की कृषि आज भी 50 प्रतिशत से अधिक वर्षा पर निर्भर है। कमजोर मानसून का अर्थव्यवस्था पर बहुआयामी प्रभाव पड़ता है:

  • खाद्य महंगाई: उत्पादन में कमी से दलहन और अनाज की कीमतों में उछाल आ सकता है।

  • ग्रामीण मांग में गिरावट: किसानों की आय कम होने से ट्रैक्टर, उर्वरक, बीज और दोपहिया वाहनों की बिक्री पर सीधा असर पड़ता है।

  • ऊर्जा क्षेत्र: कम बारिश और बढ़ते तापमान के कारण बिजली की मांग (कूलिंग सेक्टर) में भारी वृद्धि देखी जा सकती है।

मौसम विशेषज्ञों और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूर्वानुमान को देखते हुए सरकार को समय रहते जल संरक्षण उपायों को मजबूत करना चाहिए। साथ ही सूखा प्रतिरोधी फसल किस्मों के प्रसार और फसल बीमा योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

किसानों को भी सलाह दी जा रही है कि वे कम पानी में उगने वाली फसलों को प्राथमिकता दें और मौसम विभाग द्वारा जारी किए जाने वाले अपडेट पर लगातार नजर बनाए रखें।

विशेषज्ञों के अनुसार यदि समय रहते उचित रणनीति अपनाई जाती है तो संभावित कमजोर मानसून के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

YuvaSahakar Desk

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