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ओबीसी क्रीमीलेयर तय करने में माता-पिता के पद की श्रेणी भी होगी अहम

यह विवाद 8 अगस्त 1993 के कार्यालय ज्ञापन और 14 अक्टूबर 2004 के स्पष्टीकरण की व्याख्या से जुड़ा है

Published: 14:21pm, 06 Nov 2026

सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी क्रीमीलेयर तय करने से जुड़े अपने 11 मार्च के फैसले पर केंद्र सरकार की स्पष्टीकरण याचिका का निपटारा करते हुए स्पष्ट किया है कि यह फैसला इस मामले से जुड़े पक्षों पर ही लागू होगा। पहले से तय वरिष्ठता और पदोन्नति के मामलों को दोबारा नहीं खोला जाएगा, जबकि लंबित मामलों पर संबंधित अदालतें उनके तथ्यों और पात्रता के आधार पर निर्णय लेंगी।

न्यायमूर्ति पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र को फैसले के अनुपालन के लिए आठ सप्ताह का अतिरिक्त समय भी दिया है।

11 मार्च के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी ओबीसी अभ्यर्थी का क्रीमीलेयर दर्जा केवल उसके माता-पिता की वेतन से होने वाली आय के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए माता-पिता के पद की श्रेणी और स्थिति को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

केंद्र सरकार ने आशंका जताई थी कि यदि इस फैसले को पुराने मामलों पर भी लागू किया गया तो केंद्र, 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पहले से पूरी हो चुकी भर्तियों और दाखिलों पर असर पड़ सकता है। इससे ओबीसी-एनसीएल दर्जे, वरिष्ठता, सेवा शर्तों और करियर प्रगति को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है।

केंद्र ने अदालत से दो साल का समय भी मांगा था, ताकि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, बैंकों, विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों के पदों की सरकारी पदों से समानता तय की जा सके।

यह विवाद 8 अगस्त 1993 के कार्यालय ज्ञापन और 14 अक्टूबर 2004 के स्पष्टीकरण की व्याख्या से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 2004 का स्पष्टीकरण 1993 की नीति में ऐसी नई शर्त नहीं जोड़ सकता, जो मूल नीति का हिस्सा न हो।

अदालत ने यह भी कहा था कि समान स्थिति वाले सरकारी और गैर-सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के साथ अलग व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के सिद्धांत के खिलाफ हो सकता है।

YuvaSahakar Desk