सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए और विवादास्पद नियमों पर फिलहाल रोक लगा दी है। 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित इन नए नियमों को लेकर देशभर में विरोध और असंतोष की स्थिति बनी हुई थी। विभिन्न याचिकाओं के माध्यम से कहा गया था कि इन नियमों में जाति से संबंधित प्रावधानों की भाषा स्पष्ट नहीं है और इससे कुछ वर्गों के खिलाफ भेदभाव तथा मनमाने ढंग से कार्रवाई की आशंका पैदा होती है। इन याचिकाओं पर 29 जनवरी को सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने अंतरिम आदेश में कहा कि अगले आदेश तक 2012 के पूर्ववर्ती दिशानिर्देश ही लागू और प्रभावी रहेंगे।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान नए नियमों की भाषा और मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रथम दृष्टया ये नियम अस्पष्ट हैं और इनका दुरुपयोग संभव है। अदालत की टिप्पणी ऐसे समय पर आई है जब छात्र समुदाय के एक बड़े हिस्से में नए नियमों को लेकर चिंता बढ़ी हुई थी और अलग-अलग राज्यों में सांकेतिक प्रदर्शन भी सामने आ रहे थे।
अदालत ने कहा कि शिक्षा संस्थानों में किसी भी प्रकार का विभाजनकारी माहौल न बने, यह सुनिश्चित करना सभी हितधारकों की जिम्मेदारी है। कोर्ट ने इस बात को भी रेखांकित किया कि शैक्षणिक परिसरों (campus) का वातावरण देश की सामाजिक एकता और संवैधानिक मूल्यों का प्रतिबिंब होना चाहिए।
2012 के नियम फिलहाल लागू रहेंगे
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि इस चरण में अदालत किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंच रही है, लेकिन चूंकि नए नियमों की भाषा अस्पष्ट प्रतीत होती है, इसलिए अंतरिम व्यवस्था के तौर पर 2012 के दिशानिर्देशों को ही लागू रखा जाएगा। अदालत ने कहा कि यह आवश्यक है कि नियमों के उद्देश्य और शब्दों की व्याख्या को लेकर किसी भी प्रकार का भ्रम न रहे, ताकि भविष्य में कोई पक्ष इन्हें मनमाने ढंग से इस्तेमाल न कर सके।
कोर्ट के आदेश के बाद फिलहाल यूजीसी के नए नियमों पर “स्टे” लागू हो गया है। इससे याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाई गई चिंताओं को अस्थायी राहत मिली है।
CJI की प्रमुख टिप्पणियां: जातिविहीन समाज की दिशा और एकता पर जोर
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने समाज में जातिगत विभाजन को लेकर व्यापक संदर्भ में टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि भारत को जातिविहीन समाज की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जिन्हें सुरक्षा की जरूरत है, उनके लिए प्रभावी तंत्र उपलब्ध हो।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “75 वर्षों में जातिविहीन समाज की ओर बढ़ने से हमने जो कुछ भी हासिल किया है, क्या यह पीछे की ओर जाना है?” अदालत ने संकेत दिया कि किसी भी नियमन का उद्देश्य समाज को पीछे ले जाने के बजाय, संवैधानिक समानता और न्याय की भावना को मजबूत करना होना चाहिए।
पीठ ने यह भी कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में ऐसा माहौल नहीं बनना चाहिए जो अलगाव की ओर ले जाए। अदालत ने विदेशों के उदाहरण का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत को उस स्तर पर नहीं जाना चाहिए जहां अलग-अलग वर्गों के लिए अलग स्कूलों जैसी स्थिति उत्पन्न हो। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि भारत की एकता हमारे शैक्षणिक संस्थानों में झलकनी चाहिए और विश्वविद्यालय, स्कूल, कॉलेज किसी भी रूप में अलग-थलग नहीं रह सकते।
अदालत ने एक और अहम टिप्पणी में कहा कि यदि कैंपस के भीतर अलगाव या विभाजनकारी प्रवृत्तियां पनपेंगी तो उसका असर समाज पर व्यापक रूप से पड़ेगा। कोर्ट ने कहा कि अगर परिसर के भीतर यह स्थिति रहेगी तो परिसर के बाहर लोगों का व्यवहार और सामाजिक ताना-बाना प्रभावित हो सकता है।
नियम अस्पष्ट, दुरुपयोग की आशंका
मुख्य न्यायाधीश ने प्रथम दृष्टया यह भी कहा कि नए नियमों की भाषा अस्पष्ट है। उन्होंने कहा, “मुझे खेद है कि प्रथम दृष्टया ये नियम अस्पष्ट हैं और इनका दुरुपयोग होने की संभावना है. प्रयुक्त भाषा भी अस्पष्ट है.” कोर्ट ने संकेत दिया कि ऐसे नियमन की व्याख्या में यदि अस्पष्टता रहेगी तो किसी भी प्रशासनिक या संस्थागत स्तर पर उसका गलत इस्तेमाल किया जा सकता है।
इस सुनवाई के दौरान न्यायालय ने नियमों में प्रयुक्त शब्दों पर भी सवाल उठाए। पीठ ने माना कि नियमों में स्पष्टता और संतुलन होना अनिवार्य है, ताकि किसी भी वर्ग के साथ अन्याय की स्थिति न बने।
केंद्र सरकार को नोटिस, जवाब मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए याचिकाओं में उठाए गए सभी मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने को कहा है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र को इस मामले में अपना पक्ष विस्तृत रूप से प्रस्तुत करना होगा।
कोर्ट ने यह निर्देश भी दिया कि इन विनियमों की समीक्षा करने की आवश्यकता है और सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नियमों के प्रावधान किसी भी समुदाय या वर्ग के खिलाफ भेदभावपूर्ण न दिखें, न ही इनके माध्यम से सामाजिक विभाजन को बढ़ावा मिले।
विशेषज्ञ समिति बनाने का सुझाव
शीर्ष अदालत ने संकेत दिया कि नियमों की भाषा को स्पष्ट करने के लिए विशेषज्ञों की भूमिका जरूरी है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इन नियमों की समीक्षा के लिए शिक्षाविदों, न्यायविदों और सामाजिक अभिकर्ताओं/सोशल इंजीनियरों की एक समिति गठित की जानी चाहिए। कोर्ट के अनुसार, विशेषज्ञ समिति यह देख सकती है कि नियमों की मंशा क्या है, किस संदर्भ में शब्दों का प्रयोग किया गया है और क्या प्रावधान संविधान की भावना के अनुरूप हैं।
अदालत ने कहा, “हम आज कह रहे हैं कि 2012 के नियम अगले आदेश तक लागू रहेंगे. भाषा को स्पष्ट करने के लिए विशेषज्ञों की आवश्यकता है.”
अगली सुनवाई मार्च में
कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई मार्च के महीने में निर्धारित की है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अगली तारीख 19 मार्च तय की गई है। इस अवधि के दौरान केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करना होगा, साथ ही याचिकाओं में उठाई गई चिंताओं पर विस्तृत विचार भी करना होगा।
अंतरिम आदेश के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि जब तक कोर्ट अगला आदेश नहीं देता, तब तक नए नियम लागू नहीं होंगे और पुरानी व्यवस्था के तहत ही दिशा-निर्देश प्रभावी रहेंगे।


