रतीय नागरिकों के विदेश भेजे जाने वाले धन के स्वरूप में महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, उदारीकृत धनप्रेषण योजना यानी लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम के तहत मई 2026 में विदेश भेजी गई राशि सालाना आधार पर 3.6 प्रतिशत बढ़कर 2.396 अरब डॉलर हो गई। मई 2025 में यह 2.313 अरब डॉलर थी। अप्रैल 2026 के 2.286 अरब डॉलर की तुलना में भी इसमें 4.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह विदेश में निवेश और बैंक जमा के लिए भेजी गई रकम में तेज उछाल रहा। विदेशी इक्विटी और डेट इंस्ट्रूमेंट में निवेश के लिए भेजी गई राशि बढ़कर 36.36 करोड़ डॉलर हो गई, जो मई 2025 के 10.49 करोड़ डॉलर से तीन गुने से भी अधिक है। इसी तरह, विदेशी बैंक खातों में जमा के लिए भेजा गया धन 5.46 करोड़ डॉलर से बढ़कर 11.81 करोड़ डॉलर हो गया। इससे संकेत मिलता है कि भारतीय निवेशक अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपने निवेश का दायरा बढ़ा रहे हैं।
हालांकि विदेश यात्रा अब भी एलआरएस के तहत सबसे बड़ी खर्च श्रेणी बनी हुई है। मई में यात्रा के लिए 1.28 अरब डॉलर भेजे गए, लेकिन यह पिछले वर्ष से लगभग 7.7 प्रतिशत कम है। विदेश में पढ़ाई के लिए भेजी गई राशि भी 38 प्रतिशत घटकर 9.26 करोड़ डॉलर रह गई। उपहार के रूप में भेजी गई रकम 13.6 प्रतिशत घटकर 20.15 करोड़ डॉलर और विदेशी संपत्ति खरीदने के लिए भेजी गई राशि 14.22 प्रतिशत कम होकर 3.58 करोड़ डॉलर रही।
पूरे अप्रैल-मई 2026-27 के दौरान एलआरएस से कुल 4.68 अरब डॉलर विदेश भेजे गए, जो पिछले वर्ष की समान अवधि से 2.33 प्रतिशत कम है। इस दौरान यात्रा पर रेमिटेंस 8 प्रतिशत और विदेशी शिक्षा पर खर्च 18.3 प्रतिशत घटा। इसके विपरीत विदेशी जमा में 43 प्रतिशत और इक्विटी-डेट निवेश में 95.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह रुझान बताता है कि विदेशी धनप्रेषण का झुकाव उपभोग आधारित खर्च से धीरे-धीरे निवेश आधारित गतिविधियों की ओर बढ़ रहा है।
एलआरएस वर्ष 2004 में शुरू की गई थी। इसके तहत भारत में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति एक वित्त वर्ष में अधिकतम 2.50 लाख डॉलर अनुमत चालू और पूंजीगत लेनदेन के लिए विदेश भेज सकता है। इस सीमा तक सामान्यतः आरबीआई की पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होती, हालांकि बैंक शुल्क, कर और अन्य नियामकीय नियम लागू हो सकते हैं। शुरुआत में इसकी सीमा 25 हजार डॉलर थी, जिसे समय-समय पर बढ़ाया गया।
मई के आंकड़े भारतीय परिवारों की बदलती वित्तीय प्राथमिकताओं को दर्शाते हैं। विदेश यात्रा और शिक्षा पर खर्च कम हुआ है, जबकि वैश्विक शेयर और बैंक जमा में निवेश तेजी से बढ़ा है।


