भारत सरकार के नीति आयोग ने जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा देने और वहां के बागवानी क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के लिए एक दूरगामी विजन डॉक्युमेंट तैयार किया है। ‘विजन 2047’ के तहत तैयार इस खाके का मुख्य उद्देश्य प्रदेश की बागवानी को एक उच्च-मूल्य वाले (High-Value) और निर्यात-आधारित (Export-Oriented) इंजन के रूप में बदलना है। इस पहल से न केवल राज्य की जीडीपी (GDP) में क्रांतिकारी वृद्धि होगी, बल्कि स्थानीय बागवानों की आय में भी अभूतपूर्व बढ़ोतरी की उम्मीद है।
अर्थव्यवस्था की रीढ़: 35 लाख लोगों का सहारा
आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर की कुल जीडीपी में बागवानी क्षेत्र का योगदान वर्तमान में लगभग 7 प्रतिशत है। यह क्षेत्र सीधे तौर पर करीब 35 लाख लोगों की आजीविका का मुख्य आधार है। हालांकि, आयोग ने अपनी रिपोर्ट में चिंता व्यक्त की है कि पुराने पड़ चुके बागों और फसल कटाई के बाद (Post-Harvest) होने वाले भारी नुकसान के कारण वर्तमान पैदावार अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं है। इसी कमी को दूर करने के लिए नीति आयोग ने एक विस्तृत रणनीति पेश की है।
ऑपरेशन गोल्डन ग्रीन्स: आधुनिक बागवानी का नया युग
नीति आयोग ने इस क्षेत्र के आधुनिकीकरण के लिए ‘ऑपरेशन गोल्डन ग्रीन्स’ नामक एक मिशन-मोड पहल का प्रस्ताव दिया है। इस रणनीति के केंद्र में तीन प्रमुख मोर्चे हैं:
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पुराने और कम उत्पादकता वाले बागों का वैज्ञानिक कायाकल्प।
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कोल्ड-चेन बुनियादी ढांचे का व्यापक विस्तार ताकि फसल की गुणवत्ता बनी रहे।
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डिजिटल ट्रेसेबिलिटी सुनिश्चित करना, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कश्मीरी उत्पादों की विश्वसनीयता और पहुंच आसान हो सके।
यह रणनीति केवल मात्रात्मक उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्पादों की गुणवत्ता और वैश्विक निर्यात मानकों को पूरा करने पर विशेष ध्यान केंद्रित करती है।
हाई-डेंसिटी प्लांटेशन: 10 साल का सफर 3 साल में
रिपोर्ट में हाई-डेंसिटी प्लांटेशन (सघन बागवानी) को गेम-चेंजर बताया गया है। यह एक ऐसी आधुनिक तकनीक है जिसमें पारंपरिक बागों के मुकाबले प्रति हेक्टेयर पेड़ों की संख्या बहुत अधिक होती है। जहाँ पारंपरिक पेड़ों में फल आने में 7 से 10 साल का समय लगता है, वहीं इस तकनीक में इस्तेमाल होने वाले ‘बौने किस्म’ के पेड़ मात्र 2 से 3 साल में फल देने लगते हैं। इससे सेब और अखरोट की पैदावार न केवल बढ़ेगी, बल्कि उनकी गुणवत्ता भी अंतरराष्ट्रीय स्तर की होगी।
तीन चरणों वाला रणनीतिक रोडमैप (2026-2047)
नीति आयोग ने इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए 2047 तक की समयसीमा को तीन चरणों में विभाजित किया है:
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प्रथम चरण (2026-2030): इसमें जमीनी सर्वेक्षण, आधुनिक नर्सरी की स्थापना और कोल्ड-चेन के बुनियादी ढांचे के निर्माण पर ध्यान दिया जाएगा।
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द्वितीय चरण (2030-2035): इस दौरान संस्थागत ढांचे का विस्तार किया जाएगा और स्थानीय समूहों को राष्ट्रीय व वैश्विक बाजारों से जोड़ा जाएगा।
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तृतीय चरण (2035-2047): अंतिम चरण का लक्ष्य जलवायु-अनुकूल खेती (Climate-Resilient Farming) को स्थापित करना और एक स्थायी वैश्विक निर्यात बाजार का निर्माण करना है।
7 लाख परिवारों को उद्यमी बनाने का संकल्प
रिपोर्ट में केसर और अखरोट जैसी उच्च-मूल्य वाली फसलों पर विशेष ध्यान देने की सिफारिश की गई है। इस योजना का एक प्रमुख सामाजिक-आर्थिक उद्देश्य लगभग 7 लाख परिवारों को सामान्य पारंपरिक खेती से निकालकर उच्च-आय वाली ‘कृषि-उद्यमिता’ (Agri-Entrepreneurship) की ओर अग्रसर करना है। इसके साथ ही, उत्पादों की GI टैगिंग और आधुनिक अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन को अनिवार्य बनाया जाएगा, जिससे कश्मीरी उत्पादों को वैश्विक मंडियों में प्रीमियम दाम मिल सकेंगे।


