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भारत में 5.4 से घटकर 5.2% हुई बेरोजगारी दर, मानसून सीजन में बढ़े स्व-रोजगार के अवसर

शहरी क्षेत्रों में स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। शहरी बेरोजगारी दर हल्की बढ़त के साथ 6.9 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो अप्रैल-जून तिमाही के 6.8 प्रतिशत से अधिक है।

Published: 15:29pm, 11 Nov 2025

भारत के रोजगार बाजार में जुलाई–सितंबर 2025 तिमाही के दौरान हल्के सुधार के संकेत मिले हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labour Force Survey-PLFS) के अनुसार, देश की बेरोजगारी दर 5.2% पर आ गई है, जबकि पिछली तिमाही (अप्रैल–जून) में यह 5.4% थी।

रिपोर्ट के अनुसार, यह सुधार मुख्यतः मानसून के मौसम में कृषि गतिविधियों के बढ़ने और ग्रामीण इलाकों में अस्थायी रोजगार सृजन के कारण देखा गया। ग्रामीण क्षेत्रों में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग की बेरोजगारी दर घटकर 4.4% पर पहुंच गई, जो पिछली तिमाही के 4.8% से कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुधार मौसमी है और दीर्घकालिक स्थिरता के लिए औद्योगिक और विनिर्माण क्षेत्र में ठोस निवेश की आवश्यकता है।

हालांकि, शहरी क्षेत्रों की स्थिति अपेक्षाकृत स्थिर नहीं रही। रिपोर्ट में बताया गया है कि शहरी बेरोजगारी दर हल्की बढ़त के साथ 6.9% पर पहुंच गई है (पिछली तिमाही में 6.8%)। यह संकेत है कि गैर-कृषि क्षेत्रों और विनिर्माण उद्योगों में अब भी निरंतर सुधार की आवश्यकता है।

महिलाओं की भागीदारी में सुधार, पर असमानता बरकरार

PLFS के आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं की श्रम भागीदारी दर मामूली वृद्धि के साथ 33.7% पर पहुंची है, जो पिछली तिमाही में 33.4% थी। यह वृद्धि सीमित होते हुए भी सामाजिक-आर्थिक बदलाव का संकेत देती है। हालांकि, शहरी महिलाओं की बेरोजगारी दर बढ़कर 9% तक पहुंच गई है, जबकि पुरुषों में यह दर 6.2% पर स्थिर रही। इससे स्पष्ट होता है कि लैंगिक असमानता अब भी रोजगार के क्षेत्र में एक चुनौती बनी हुई है।

ग्रामीण क्षेत्रों में स्व-रोजगार और कृषि आधारित नौकरियों में बढ़ोतरी

कार्यकर्ता जनसंख्या अनुपात (Worker Population Ratio) बढ़कर 52.2% हो गया है, जो पिछली तिमाही में 52.0% था। ग्रामीण क्षेत्रों में स्व-रोजगार की हिस्सेदारी 60.7% से बढ़कर 62.8% हो गई, जबकि कृषि में कार्यरत श्रमिकों का अनुपात 57.7% तक पहुंच गया (पिछली तिमाही में 53.5%)। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि मानसूनी सीजन में कृषि आधारित अस्थायी रोजगार की भूमिका अब भी प्रमुख बनी हुई है।

सेवा क्षेत्र का वर्चस्व और शहरी संरचना की चुनौतियां

शहरी क्षेत्रों में नियमित वेतनभोगी नौकरियों का अनुपात 49.8% दर्ज किया गया, जबकि सेवा क्षेत्र अब शहरी कार्यबल का लगभग 62% हिस्सा बन चुका है। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि भारत की अर्थव्यवस्था में सेवाक्षेत्र का महत्व निरंतर बढ़ रहा है, किंतु विनिर्माण और औद्योगिक विस्तार की गति अभी सीमित है।

संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता

विशेषज्ञों का कहना है कि बेरोजगारी दर में यह गिरावट सकारात्मक संकेत है, लेकिन रोजगार ढांचा अभी भी मौसमी गतिविधियों पर आधारित है। श्रम भागीदारी दर में मामूली वृद्धि (55.0% से 55.1%) बताती है कि स्थायी और संगठित क्षेत्र में रोजगार सृजन की आवश्यकता बनी हुई है। सरकार के “मेक इन इंडिया” और “ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब” जैसे अभियानों को गति देना दीर्घकालिक रोजगार स्थिरता के लिए आवश्यक है।

YuvaSahakar Desk