भारत में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। अब छात्रों को विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई के लिए विदेश जाने की आवश्यकता कम पड़ सकती है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने देश में विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस स्थापित करने की प्रक्रिया को तेज कर दिया है। शिक्षा राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार ने लोकसभा में लिखित जवाब में बताया कि अब तक 15 विदेशी विश्वविद्यालयों को कुल 16 लेटर ऑफ इंटेंट (LoI) जारी किए जा चुके हैं।
यूजीसी के अनुसार ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्रिटेन और इटली के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय भारत में अपने कैंपस स्थापित करेंगे। इन संस्थानों के आने से भारतीय छात्रों को अपने ही देश में अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलेगा।
इन विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस देश के प्रमुख शिक्षा और औद्योगिक केंद्रों में स्थापित किए जाएंगे। इनमें बेंगलुरु, ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम, मुंबई और चेन्नई जैसे शहर शामिल हैं। इन शहरों का चयन इसलिए किया गया है क्योंकि यहां पहले से उच्च शिक्षा का मजबूत आधार और रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं।
नए कैंपस में छात्रों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा साइंस, साइबर सिक्योरिटी सहित अन्य उभरते क्षेत्रों में पढ़ाई का अवसर मिलेगा। इन विषयों की वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ती मांग को देखते हुए इन्हें पाठ्यक्रम का प्रमुख हिस्सा बनाया जाएगा।
यूजीसी ने स्पष्ट किया है कि भारत में कैंपस खोलने की अनुमति केवल विश्व की शीर्ष 500 विश्वविद्यालयों को ही दी जाएगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि छात्रों को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा उपलब्ध हो।
अनुमति प्रक्रिया को सरल और तेज बनाने के लिए यूजीसी ने सिंगल-विंडो क्लियरेंस सिस्टम शुरू किया है। इसके माध्यम से विदेशी विश्वविद्यालयों को आवश्यक मंजूरियां एक ही प्लेटफॉर्म पर मिल सकेंगी, जिससे कैंपस स्थापित करने की प्रक्रिया में तेजी आएगी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों द्वारा प्रदान की जाने वाली डिग्रियों को भारतीय डिग्री के समकक्ष मान्यता मिलेगी। छात्रों को अलग से डिग्री समकक्षता प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होगी, जिससे आगे की पढ़ाई और रोजगार में सुविधा मिलेगी।
विदेशी विश्वविद्यालयों की सहायता के लिए यूजीसी ने एक फैसिलिटेशन कमेटी का भी गठन किया है। यह समिति कैंपस स्थापना और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में संस्थानों का सहयोग करेगी।
इस पहल से भारतीय छात्रों को कम खर्च में अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा अपने देश में ही उपलब्ध हो सकेगी। विदेश में रहने और यात्रा पर होने वाला खर्च बचेगा, वहीं भारत को वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में भी यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


