सहकारी संस्थाएं अब सिर्फ कर्ज देने वाली संस्थाएं नहीं रह गई हैं, बल्कि वह ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाली नई ताकत बनकर उभर रही हैं। खासतौर पर प्राथमिक कृषि ऋण समितियां (PACS) अब गांवों में रोजगार, सेवाओं और डिजिटल सुविधाओं के नए केंद्र के रूप में विकसित हो रही हैं। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा गुरुवार को संसद में पेश Economic Survey 2025-26 में यह जानकारी दी गई है।
Economic Survey में बताया गया है कि नए मॉडल बायलॉज के लागू होने के बाद PACS को अब 25 से अधिक कारोबार करने की अनुमति मिल गई है। इनमें बीज, खाद और कृषि इनपुट की आपूर्ति, अनाज भंडारण और प्रसंस्करण, पेट्रोल पंप, जनऔषधि केंद्र, पीडीएस की दुकानें और सीएससी खोलना, सरकारी योजनाओं और सेवाओं की डिलीवरी करना शामिल है। इससे PACS अब गांवों में बहुउद्देश्यीय सेवा केंद्र के रूप में काम कर रही हैं।
Economic Survey में बताया गया है कि सहकारी क्षेत्र में बड़े स्तर पर डिजिटलीकरण किया गया है जिससे पैक्स ने पारदर्शिता और भरोसे की नई पहचान बनाई है। केंद्रीय सहकारिता मंत्रालय ने 67,930 PACS के कंप्यूटरीकरण को मंजूरी दी जिसके लिए 900 करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय सहायता मंजूर की गई। इसके तहत 54,150 PACS ईआरपी सॉफ्टवेयर से जुड़ चुकी हैं, जबकि 43,658 PACS पूरी तरह डिजिटल रूप से लाइव हो चुके हैं। सहकारी क्षेत्र का डिजिटलीकरण होने से लेनदेन में पारदर्शिता बढ़ी है और युवाओं का भरोसा सहकारी संस्थाओं पर मजबूत हुआ है।
सरकार का लक्ष्य है कि हर पंचायत में कम से कम एक बहुउद्देश्यीय सहकारी संस्था हो। इस दिशा में मार्च 2025 तक 18,183 नई सहकारी समितियां पंजीकृत की जा चुकी हैं। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार, स्वरोजगार और उद्यमिता के नए अवसर बन रहे हैं। अनाज भंडारण में PACS की अहम भूमिका को आर्थिक सर्वेक्षण में रेखांकित करने हुए बताया गया है कि 500 नए गोदामों का निर्माण कार्य चल रहा है। इससे किसानों को फसल के बाद नुकसान से राहत मिलेगी और उन्हें सही समय पर बेहतर दाम मिल सकेंगे।
युवाओं के लिए नई संभावनाएं
सहकारी आंदोलन को मजबूत करने के लिए त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है। साथ ही, शिक्षा और प्रशिक्षण के जरिए युवाओं को सहकारिता से जोड़ा जा रहा है, ताकि वे सहकारी नेतृत्व संभालें, पेशेवर प्रबंधन लाएं और गांवों में उद्यमिता को बढ़ावा दें। यदि बेहतर शासन और पेशेवर प्रबंधन जारी रहा, तो सहकारिता ग्रामीण भारत और युवाओं के भविष्य की मजबूत नींव बन सकती है।


