भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की शुरुआत स्कूलों से होती है। जब कोई बच्चा शुरुआती कक्षाओं में पढ़ना, लिखना, समझना और सामान्य गणितीय प्रश्नों को हल करना सीखता है, तभी उसकी आगे की शिक्षा की मजबूत नींव तैयार होती है। इसी सोच के साथ केंद्र सरकार ने वर्ष 2021 में निपुण भारत मिशन की शुरुआत की थी।
मिशन का लक्ष्य है कि कक्षा तीन तक पहुंचने वाला प्रत्येक बच्चा अपनी आयु और कक्षा के अनुरूप पाठ को समझकर पढ़ सके तथा बुनियादी गणितीय कौशल हासिल कर सके। भारत में लगभग 25 करोड़ विद्यार्थी, 98 लाख शिक्षक और 15 लाख विद्यालय हैं। इतनी बड़ी शिक्षा व्यवस्था में बच्चों का स्कूल तक पहुंचना महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन केवल नामांकन पर्याप्त नहीं है। वास्तविक सफलता तभी है, जब बच्चे स्कूल में सीख भी रहे हों।
लंबे समय तक बड़ी संख्या में बच्चे आवश्यक बुनियादी कौशल हासिल किए बिना अगली कक्षाओं में पहुंचते रहे। इस स्थिति को ‘लर्निंग क्राइसिस’ के रूप में पहचाना गया। निपुण भारत मिशन ने इसी चुनौती से निपटने के लिए शिक्षण व्यवस्था को परिणाम आधारित बनाने पर जोर दिया। मिशन के लिए शुरुआती दौर में लगभग 2,000 करोड़ रुपये का प्रावधान था, जिसे बढ़ाकर करीब 4,800 करोड़ रुपये किया गया है।
हाल के आकलनों में बच्चों के सीखने के स्तर में सुधार के संकेत मिले हैं। कक्षा तीन के विद्यार्थियों ने भाषा में औसतन 64 प्रतिशत और गणित में लगभग 60 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। असर-2024 की रिपोर्ट में भी शुरुआती कक्षाओं में पढ़ने की क्षमता में सुधार दर्ज किया गया है। हालांकि राष्ट्रीय औसत के पीछे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों, सामाजिक समूहों तथा अलग-अलग भाषाई पृष्ठभूमि वाले बच्चों के बीच असमानताएं अब भी मौजूद हैं।
इन चुनौतियों को कम करने के लिए स्कूलों में प्रिंट-समृद्ध कक्षाएं, गतिविधि आधारित शिक्षण, कार्यपुस्तिकाएं और खेल के माध्यम से सीखने की व्यवस्था विकसित की जा रही है। शिक्षकों को भी बच्चों की सीखने की गति और जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षण एवं सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है।
शुरुआती कक्षाओं में पढ़ना, तर्क करना और समस्याओं का समाधान सीखने वाला बच्चा आगे चलकर आत्मविश्वासी विद्यार्थी, जिम्मेदार नागरिक और कुशल कार्यबल बनता है। इसलिए विकसित भारत की मजबूत नींव किसी बड़े भवन या परियोजना से नहीं, बल्कि कक्षा में सीख रहे प्रत्येक बच्चे से तैयार होगी।


