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कैंपस कोऑपरेटिव से युवाओं में बढ़ेगी जागरूकता: मनीष संघाणी

गुजरात के अमरेली जिला सहकारी संघ के युवा अध्यक्ष मनीष संघाणी राज्य के विभिन्न कॉलेजों में कैंपस कोऑपरेटिव बनाने को लेकर काफी सक्रिय हैं। इस बारे में अभिषेक राजा और नुरुल कुसैन ने उनसे विस्तार से बातचीत की और यह समझने की कोशिश की कि युवाओं को कोऑपरेटिव के प्रति आकर्षित करने में यह कैसे सहायक है।

अमरेली जिला सहकारी संघ के अध्यक्ष मनीष संघाणी


Published: 09:00am, 24 Jan 2026

युवाओं को कोऑपरेटिव से जोड़ने के लिए केंद्रीय सहकारिता मंत्रालय लगातार प्रयासरत है। नई सहकारिता नीति में भी इसके लिए कई सारे प्रावधान किए गए हैं। इस कड़ी में यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में कैंपस कोऑपरेटिव बनाने के प्रावधान भी शामिल हैं। गुजरात के अमरेली जिला सहकारी संघ के युवा अध्यक्ष मनीष संघाणी राज्य के विभिन्न कॉलेजों में कैंपस कोऑपरेटिव बनाने को लेकर काफी सक्रिय हैं। इस बारे में अभिषेक राजा और नुरुल कुसैन ने उनसे विस्तार से बातचीत की और यह समझने की कोशिश की कि युवाओं को कोऑपरेटिव के प्रति आकर्षित करने में यह कैसे सहायक है। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंशः  

कैंपस कोऑपरेटिव क्या है और यह कैसे काम करता है?

वर्ष 2021 में जब पहली बार केंद्रीय स्तर पर अलग सहकारिता मंत्रालय का गठन हुआ तो केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित भाई शाह ने युवाओं को कोऑपरेटिव से जोड़ने के लिए कैंपस कोऑपरेटिव बनाने का सुझाव दिया था। उनके सुझाव को ध्यान में रखते हुए ही मैंने अमरेली शहर में स्थित कमानी साइंस एंड आर्ट्स कॉलेज में और सावरकुंडला तहसील स्थित आर्ट्स एंड कॉमर्स कॉलेज में  कोऑपरेटिव सोसायटी बनाई। उनके बायलॉज इस तरह के बनाए गए हैं कि उनमें कोई प्रोफेसर या कर्मचारी चेयरमैन या डायरेक्टर नहीं हो सकते। फाइनल ईयर का कोई छात्र ही चेयरमैन होगा और उसके पासआउट होते ही उसका कार्यकाल खुद ही समाप्त हो जाएगा। जबकि फर्स्ट ईयर से लेकर फाइनल ईयर तक के छात्र सोसायटी के मेंबर और डायरेक्टर बन सकते हैं। युवाओं को कॉलेज स्तर से ही कोऑपरेटिव से जोड़ना होगा ताकि आगे चलकर जब वह इस क्षेत्र में काम करेंगे तो कॉलेज में मिला अनुभव उनके काम आएगा। 

बुक से लेकर नोटबुक, पेन-पेंसिल एवं पढ़ाई की अन्य सामग्री सभी स्टूडेंट्स की जरूरत है। वह इसे कहीं न कहीं से जरूर खरीदते हैं। कैंपस कोऑपरेटिव के माध्यम से इन जरूरी सामानों को कॉलेजों या यूनिवर्सिटी के कैंपस में ही उपलब्ध कराया जाता है। कोऑपरेटिव इन्हें थोक भाव में खरीदते हैं और सामान्य दुकानदारों की तुलना में कम मार्जिन पर बेचते हैं। स्टूडेंट्स को इससे दोहरा फायदा होता है। एक तो बाजार की तुलना में उचित कीमत पर उनकी जरूरत का सामान मिल जाता है, दूसरा, जो स्टूडेंट इसके सदस्य होते हैं उन्हें बिक्री से हुए मुनाफे में हिस्सेदारी भी मिलती है। मैंने उन्हें त्योहारों के दौरान कपड़े एवं अन्य सामानों को भी बेचने की सलाह दी है। पिछले साल इन कॉलेजों की छात्राओं ने रक्षाबंधन के दौरान राखी बनाकर कैंपस कोऑपरेटिव के माध्यम से बेची। इससे उन्हें मेहनताना तो मिला ही, कैंपस कोऑपरेटिव को जो आमदनी हुई उसमें भी हिस्सेदारी मिली। कैंपस कोऑपरेटिव को भी आमदनी बढ़ाने का नया माध्यम मिल गया। हमने बायलॉज में यह भी प्रावधान किया है कि जब कोऑपरेटिव की आमदनी बढ़ेगी और उनके पास पर्याप्त फंड हो जाएगा तो आर्थिक रूप से कमजोर टैलेंटेड स्टूडेंट्स की फीस भरने का फैसला भी बोर्ड ले सकेगा। 

कैंपस कोऑपरेटिव को लेकर स्टूडेंट्स की क्या प्रतिक्रिया है? क्या वह इसके प्रति आकर्षित हो रहे हैं?

कॉलेज स्टूडेंट्स में इसके बारे में जानकारी का अभाव है। हम उन्हें लगातार जागरूक कर रहे हैं। पहले वर्ष तो बहुत कम स्टूडेंट्स इसके सदस्य बने लेकिन जैसे-जैसे उनमें जागरूकता बढ़ रही है और उन्हें पता चल रहा है कि इससे जुड़ने का क्या फायदा है, वैसे-वैसे स्टूडेंट्स इसके प्रति आकर्षित हो रहे हैं और सदस्यों की संख्या बढ़ रही है। जिन कॉलेजों में हमने कैंपस कोऑपरेटिव बनाया है वहां के प्रिंसिपल को भी पहले इसकी जानकारी नहीं थी। हमने उन्हें जब इसके फायदे के बारे में विस्तार से समझाया तो वह कैंपस कोऑपरेटिव बनाने में सहयोग देने को राजी हो गए। गुजरात में कोऑपरेटिव सोसायटी बनाने के लिए न्यूनतम 100 सदस्यों और 1,000 रुपये के शेयर की आवश्यकता होती है। इसी तरह कोऑपरेटिव सोसायटी का बैंक अकाउंट खुलवाने के लिए न्यूनतम 1 लाख रुपया जमा करना होता है। चूंकि इतने स्टूडेंट्स को एक साथ जोड़ना और उन्हें इतने रुपये देने के लिए राजी करना आसान नहीं था, इसलिए मैंने डिस्ट्रिक्ट रजिस्ट्रार जो कोऑपरेटिव सोसायटी का रजिस्ट्रेशन करते हैं, उनसे इस नियम में छूट देने का आग्रह किया। उन्होंने कैंपस कोऑपरेटिव के लिए सदस्यों की संख्या घटाकर 50 और शेयर लेने के लिए न्यूनतम 100 रुपये निर्धारित कर दिया। अब बारी बैंक खाता खुलवाने में छूट प्राप्त करने की थी। मैंने स्थानीय कोऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन से इस बारे में बात की। चूंकि मैं भी उस बैंक के बोर्ड में डायरेक्टर हूं तो बोर्ड में इस नए इनिशिएटिव को लेकर छूट देने का प्रस्ताव रखा जिसे बोर्ड ने स्वीकार करते हुए खाता खुलवाने की राशि घटाकर 5,000 रुपये कर दी। इससे छात्रों को जोड़ने में बड़ी राहत मिली। अमरेली जिले में मौजूद सभी कॉलेजों में कैंपस कोऑपरेटिव बनाना मेरा मकसद है और हम इस योजना पर लगातार काम कर रहे हैं।

युवाओं को कोऑपरेटिव से जोड़ने के लिए सरकार के प्रयासों के अलावा और क्या किया जाना चाहिए?

सरकार जो प्रयास कर रही है वह तो ठीक है, लेकिन युवाओं को भी इसके लिए आगे आना होगा। जो सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं उनके लिए कोऑपरेटिव नहीं है। जो अपने आसपास के लोगों, समाज, समुदाय एवं देश की भलाई के बारे में सोचते हैं और उनके लिए कुछ करना चाहते हैं वही कोऑपरेटिव में अच्छा काम कर सकते हैं। देशभक्ति सिर्फ बॉर्डर पर ही नहीं दिखाई जा सकती, बल्कि अच्छी कोऑपरेटिव सोसायटी के माध्यम से भी लोगों, समाज एवं देश की सेवा की जा सकती है। लोगों को रोजगार एवं स्वरोजगार के अवसर मुहैया कराने से सरकार पर कम बोझ पड़ेगा और सरकार को उनके बारे में सोचना नहीं पड़ेगा। ‘मैं नहीं, सबकी’ सोच के साथ युवा आगे बढ़ेंगे तो देश खुद आगे बढ़ेगा।

कोऑपरेटिव सोसायटीज में युवा नेतृत्व बढ़ाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?  

युवाओं को इसके लिए खुद रूचि जगानी होगी। कोऑपरेटिव सेक्टर में राजनीति है लेकिन वह अलग तरह की है। आप खुद ही सोसायटी बनाकर कोऑपरेटिव सेक्टर में अपनी भागीदारी बढ़ा सकते हैं और नेतृत्व क्षमता हासिल कर सकते हैं। सोसायटी बनाने की कोई सीमा तो है नहीं। अपनी क्षमता के हिसाब से सोसायटी बनाकर काम कर सकते हैं और स्थानीय लोगों को रोजगार एवं स्वरोजगार उपलब्ध करा सकते हैं।

YuvaSahakar Team

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