बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने महाराष्ट्र के सहकारिता मंत्री बाबासाहेब पाटिल को सहकारी बैंक के निदेशक पद से हटाने के मामले में अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है। पाटिल निदेशक के रूप में 37 वर्ष पूरे कर चुके हैं। मामला निदेशकों के लगातार 10 वर्ष के कार्यकाल की सीमा से जुड़ा है।
न्यायमूर्ति नितिन बी. सूर्यवंशी और न्यायमूर्ति आबासाहेब डी. शिंदे की खंडपीठ ने शुक्रवार को यह आदेश दिया। पाटिल ने आरबीआई के 18 सितंबर, 2026 के आदेश को चुनौती दी है। कार्रवाई बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 10A(2A)(i) के तहत हुई थी।
पाटिल की दलील थी कि संशोधित प्रावधानों को अनुचित तरीके से पिछली अवधि पर लागू किया गया। उन्होंने व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर नहीं देने और निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं करने का आरोप लगाया।
आरबीआई ने कहा कि प्रावधान में ‘लगातार पद पर बने रहने’ का उल्लेख है। इसलिए इसके दायरे में जारी कार्यकाल आता है। पीठ ने इस तर्क में प्रथमदृष्टया दम पाया।
अदालत ने कोल्हापुर सर्किट पीठ की उस राय से भी सहमति जताई कि कानून का उद्देश्य लंबे समय से पदस्थ निदेशकों के हाथों में बोर्ड की शक्ति का केंद्रीकरण रोकना है। अन्य पीठों में समान याचिकाओं पर अंतरिम राहत नहीं मिलने का उल्लेख हुआ।
हालांकि, अदालत ने मूल याचिका खारिज नहीं की है। मामला आगे की सुनवाई के लिए लंबित है और अंतिम निर्णय बाकी है। यह आदेश सहकारी बैंकों में कार्यकाल संबंधी नियमों के पालन, नेतृत्व परिवर्तन और बोर्ड पुनर्गठन से जुड़े निर्णयों को प्रभावित कर सकता है।


