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कर्नाटक में सौहार्द सहकारी विधेयक पारित, आरक्षण और सख्त नियम लागू

वर्तमान में 6,500 से अधिक संस्थाएं इससे जुड़ी हैं, जिनका सालाना कारोबार ₹77,000 करोड़ से अधिक है। वर्ष 2023-24 में ही इन समितियों के पास ₹43,704 करोड़ की जमा राशि, ₹34,030 करोड़ के अग्रिम और ₹626 करोड़ का लाभ रहा।

Published: 14:31pm, 01 Sep 2025

कर्नाटक कांग्रेस सरकार ने शुक्रवार को एक रणनीतिक कदम उठाते हुए कर्नाटक सौहार्द सहकारी (संशोधन) विधेयक, 2025 पारित कर दिया। इस विधेयक को पहले विधान परिषद ने खारिज कर दिया था, लेकिन दोबारा पेश किए जाने पर इसे मंजूरी मिल गई। इससे सरकार को बड़ी राहत मिली, क्योंकि यह पहले ही विधानसभा में पुनः पारित हो चुका था।

कानून एवं संसदीय कार्य मंत्री एच.के. पाटिल ने इसे परिषद में पेश किया, जहां सभापति बसवराज होरट्टी ने इसकी स्वीकृति की घोषणा की। इससे पहले भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) ने इस विधेयक का कड़ा विरोध किया था, खासकर उस प्रावधान का जिसमें सौहार्द सहकारिताओं के लिए 20 प्रतिशत सांविधिक तरलता अनुपात (SLR) अनिवार्य किया गया है।

विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह सरकार की अति-हस्तक्षेपकारी नीति है और सहकारी समितियों की स्वायत्तता में दखल है। हालांकि कांग्रेस ने इसे वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता के लिए आवश्यक बताया। साथ ही इसे सहकारी क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने का अवसर भी माना जा रहा है।

सौहार्द, जिसे औपचारिक रूप से कर्नाटक स्टेट सौहार्द फेडरल कोऑपरेटिव लिमिटेड कहा जाता है, 1997 के कर्नाटक सौहार्द सहकारी अधिनियम के तहत स्थापित हुआ था। यह देश का पहला ऐसा शीर्ष संगठन है जो नई पीढ़ी की सहकारी समितियों का प्रतिनिधित्व करता है। वर्तमान में 6,500 से अधिक संस्थाएं इससे जुड़ी हैं, जिनका सालाना कारोबार ₹77,000 करोड़ से अधिक है। वर्ष 2023-24 में ही इन समितियों के पास ₹43,704 करोड़ की जमा राशि, ₹34,030 करोड़ के अग्रिम और ₹626 करोड़ का लाभ रहा।

नए विधेयक में कई अहम प्रावधान जोड़े गए हैं। इनमें चुनाव और बोर्ड संरचना के नियम कड़े करना, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाओं और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण बढ़ाना शामिल है। साथ ही बोर्ड सदस्यों, उम्मीदवारों और मुख्य कार्यकारियों की संपत्ति-देयता का खुलासा अनिवार्य किया गया है। अनियमितताओं की स्थिति में विशेष अधिकारियों की नियुक्ति और वित्तीय गड़बड़ी करने वालों पर आपराधिक कार्रवाई का प्रावधान भी इसमें जोड़ा गया है।

सरकार ने इन संशोधनों को जनहित और जवाबदेही सुनिश्चित करने वाला बताया है, लेकिन राजनीतिक निहितार्थ भी साफ दिखाई देते हैं। लंबे समय से सौहार्द सहकारिताओं को भाजपा का गढ़ माना जाता रहा है, ऐसे में कांग्रेस का यह कदम सहकारी क्षेत्र में अपनी पैठ मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

Diksha

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