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सहकारी समितियों से जुड़ेंगे विश्वकर्मा योजना के कारीगर, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगी मजबूती

प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के तहत 29 लाख से अधिक कारीगरों को सहकारी समितियों के माध्यम से संगठित कर आर्थिक और सामाजिक उत्थान की दिशा में कार्य किया जा रहा है। सहकारी संस्थाएं और एमएसएमई ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

Published: 11:00am, 14 Jun 2025

भारत सरकार ने कारीगरों और शिल्पकारों को आत्मनिर्भर बनाने और उनकी आजीविका को सशक्त करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए सहकारी संस्थाओं के गठन पर विशेष जोर दिया है। इस योजना के अंतर्गत 29 लाख से अधिक कारीगरों और शिल्पकारों को वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और बाजार तक पहुंच प्रदान की जा रही है, ताकि उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो और सामाजिक उत्थान संभव हो सके। सहकारी संस्थाओं के माध्यम से इन कारीगरों को संगठित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं, जो ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में समावेशी विकास का मजबूत आधार बनाएंगे।

सहकारी संस्थाएं और एमएसएमई: आर्थिक विकास के मजबूत स्तंभ

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद में संयुक्त सचिव श्री के.के. त्रिपाठी ने अपनी हालिया रिपोर्ट में बताया कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) और सहकारी संस्थाएं भारत की अर्थव्यवस्था के दो प्रमुख आधार हैं। ये संस्थाएं विशेष रूप से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में समावेशी और टिकाऊ विकास को गति प्रदान करती हैं। श्री त्रिपाठी ने जोर देकर कहा कि विश्वकर्मा योजना से जुड़े कारीगरों और पारंपरिक हस्तशिल्पियों को सहकारी समितियों के रूप में संगठित करने से उनके सामाजिक और आर्थिक उत्थान को बल मिलेगा। इससे न केवल उनकी आजीविका में सुधार होगा, बल्कि आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में भी सामूहिक प्रयासों को गति मिलेगी।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने विभिन्न मंचों पर एमएसएमई और सहकारी संस्थाओं को भारत की आर्थिक वृद्धि और सामाजिक एकता के लिए आवश्यक बताया है। उन्होंने सब्जी विक्रेताओं, दूध वालों, किराना दुकानदारों, धोबियों, अखबार विक्रेताओं, बुनकरों, कारीगरों, फूल विक्रेताओं, दर्जियों और अन्य पेशेवरों को देश की रीढ़ की संज्ञा दी है। इन पेशों से जुड़े लोग न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं, बल्कि सामाजिक समरसता को भी बढ़ावा देते हैं।

सहकारी संस्थाओं का ऐतिहासिक महत्व

भारत में सहकारी संस्थाओं का इतिहास स्वतंत्रता से पहले का है। वर्ष 1904 में सहकारी ऋण समितियां अधिनियम लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में कर्ज की गंभीर समस्या से निपटना और ऋण समितियों को औपचारिक व कानूनी पहचान प्रदान करना था। स्वतंत्रता के बाद सहकारी संस्थाओं को नीति निर्माण का एक महत्वपूर्ण उपकरण माना गया। इसका परिणाम यह हुआ कि अमूल (आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड), भारतीय किसान उर्वरक सहकारी संस्था लिमिटेड (इफको), कृषक भारती कोऑपरेटिव लिमिटेड (कृभको) और राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (नाफेड) जैसी प्रमुख सहकारी संस्थाएं विकसित हुईं। ये संस्थाएं आज भारत के आर्थिक और सामाजिक विकास के ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

एमएसएमई और सहकारी समितियों की वर्तमान स्थिति

एमएसएमई विकास आयुक्त कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार, 10 अप्रैल 2025 तक देश में 34,897 छोटी-बड़ी सहकारी संस्थाएं और 3,64,027 स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) पंजीकृत हैं। इन संस्थाओं और समूहों से ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं और पुरुष जुड़े हुए हैं, जो स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। इसके अतिरिक्त, अप्रैल 2025 तक भारत में 6.24 करोड़ से अधिक पंजीकृत एमएसएमई हैं, जो 26 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान कर रहे हैं। ये एमएसएमई देश के स्थिर मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 33% और कुल निर्यात में 48% का योगदान करते हैं। यह आंकड़ा एमएसएमई के महत्व को रेखांकित करता है।

विश्वकर्मा योजना: कारीगरों के लिए नई राह

प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के अंतर्गत 25 अप्रैल 2025 तक 29 लाख से अधिक कारीगर और शिल्पकार पंजीकृत हो चुके हैं। इस योजना में मोची, कुम्हार, बढ़ई, धोबी समेत 18 विभिन्न ट्रेड्स से जुड़े कारीगर शामिल हैं। योजना का मुख्य उद्देश्य इन पारंपरिक कारीगरों को वित्तीय सहायता, कौशल प्रशिक्षण और बाजार तक पहुंच प्रदान कर उनके उत्पादों और सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार करना है। इससे न केवल उनकी आय में वृद्धि होगी, बल्कि उनकी सामाजिक स्थिति में भी सुधार होगा।

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि विश्वकर्मा योजना से जुड़े कारीगरों को सहकारी समितियों के रूप में संगठित किया जाए। क्लस्टर और ब्लॉक स्तर पर ऐसी समितियों का गठन किया जा सकता है, जो विभिन्न शिल्पकला में विशेषज्ञता रखने वाले कारीगरों को एक मंच पर लाएंगे। इससे कारीगर अपने विशिष्ट कौशल को मिलाकर उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद बना सकेंगे, जिससे उनके व्यापार का विस्तार होगा और बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी।

जिला स्तर पर सहकारी समितियों का गठन

विश्वकर्मा योजना के तहत प्रशिक्षित कारीगर जिला स्तर पर सहकारी समितियां गठित कर सकते हैं। इन समितियों में विभिन्न शिल्पकला ट्रेड्स के विशेषज्ञ शामिल हो सकते हैं। ऐसी समितियां विविध और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों के निर्माण में सक्षम होंगी, जिससे स्थानीय और राष्ट्रीय बाजारों में उनकी मांग बढ़ेगी। यह सहकारी मॉडल न केवल कारीगरों की आय में वृद्धि करेगा, बल्कि उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को भी सुदृढ़ करेगा। सहकारी समितियां कारीगरों को सामूहिक संसाधनों, जैसे कच्चा माल, उपकरण और विपणन सुविधाओं तक पहुंच प्रदान करेंगी, जिससे उनकी उत्पादकता और लाभप्रदता में वृद्धि होगी।

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा गया है कि सहकारी एमएसएमई और विश्वकर्मा योजना का एकीकरण भारत के 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। सहकारी संस्थाओं का व्यापक फैलाव, उनकी पहुंच और रोजगार सृजन की क्षमता उन्हें आर्थिक और सामाजिक विकास का एक मजबूत आधार बनाती है। विश्वकर्मा योजना के तहत कारीगरों को सहकारी समितियों के साथ जोड़ने से न केवल उनकी आजीविका में सुधार होगा, बल्कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी। यह पहल आत्मनिर्भर भारत के विजन को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

YuvaSahakar Desk

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