भारत के ग्रामीण इलाकों की आर्थिक ताकत अब नए स्तर पर पहुंच चुकी है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, बीते एक दशक में ग्रामीण उपभोग में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। अब गांव केवल जरूरतों की पूर्ति का केंद्र न रहकर, आकांक्षाओं और विकास का नया प्रतीक बन चुके हैं।
साल 2012 में ग्रामीण भारत में मासिक प्रति व्यक्ति खर्च मात्र 1,429 रुपये था, जो 2024 में बढ़कर 4,122 रुपये हो गया है। यानी 12 वर्षों में यह तीन गुना वृद्धि दर्ज की गई। यह न केवल आय में बढ़ोतरी को दर्शाता है बल्कि यह भी संकेत देता है कि ग्रामीण परिवार अब अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा जीवन की गुणवत्ता सुधारने वाली वस्तुओं व सेवाओं पर खर्च कर रहे हैं।
इसी अवधि में शहर और गांव के बीच खर्च में अंतर भी तेज़ी से घटा है। वर्ष 2012 में जहां शहरी उपभोग ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में 84 प्रतिशत अधिक था, वहीं 2024 तक यह अंतर घटकर मात्र 70 प्रतिशत रह गया है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती और सामाजिक-आर्थिक समावेशन की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।
गांवों में खर्च के पैटर्न में भी बड़ा बदलाव दिख रहा है। पहले जहां ग्रामीण परिवार अपने कुल खर्च का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा भोजन पर खर्च करते थे, वहीं अब यह घटकर 47 प्रतिशत पर पहुंच गया है। शहरी क्षेत्रों में भी यह अनुपात 48 प्रतिशत से घटकर 40 प्रतिशत हुआ है। इसका सीधा अर्थ है कि अब ग्रामीण भारत शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, संचार सुविधा और अन्य जीवनशैली संबंधी आवश्यकताओं पर अधिक खर्च कर रहा है।
सरकार द्वारा ग्रामीण रोजगार, बुनियादी ढांचे, और डिजिटल सेवाओं के विस्तार पर किए जा रहे प्रयासों से यह आर्थिक रूपांतरण संभव हुआ है। यह परिवर्तन न सिर्फ उपभोग संरचना में बदलाव को दर्शाता है बल्कि “नए भारत” के निर्माण की जमीनी ताकत को भी उजागर करता है।


