कर्नाटक हाईकोर्ट ने किसान सहकारी समितियों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि किसान सहकारी समितियों को भी व्यक्तिगत किसानों के समान बिजली सब्सिडी का लाभ प्रदान किया जाए। कोर्ट ने इस मामले को संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार से जोड़ते हुए कहा कि सहकारी समितियों को सब्सिडी से वंचित रखना मनमानी और भेदभावपूर्ण कार्रवाई है। यह फैसला जस्टिस सचिन शंकर मगदुम की एकल पीठ ने सुनाया, जिसे हाल ही में सार्वजनिक किया गया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसान सामूहिक रूप से सिंचाई की सुविधा विकसित करते हैं और लागत कम करने के लिए सहकारी समितियों के माध्यम से संगठित होते हैं, तो उन्हें प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए, न कि सजा। कोर्ट ने यह भी कहा कि सामूहिक बिजली खपत के आधार पर सब्सिडी से इनकार करना सब्सिडी की मूल भावना के विरुद्ध है, जिसका उद्देश्य किसानों को आर्थिक राहत प्रदान करना है।
यह मामला कर्नाटक के अथनी तालुक में कृष्णा नदी पर संचालित एक लिफ्ट सिंचाई परियोजना से संबंधित है, जिसे कुछ किसान सहकारी समितियों ने शुरू किया था। यह परियोजना लगभग 300 एकड़ कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा प्रदान कर रही है। याचिकाकर्ता समितियों ने शिकायत की थी कि केवल संगठित रूप से कार्य करने के कारण उन्हें बिजली सब्सिडी से वंचित किया जा रहा है, जबकि व्यक्तिगत किसानों को यह लाभ मिल रहा है।
हुबली इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कंपनी (हैसकॉम) ने तर्क दिया कि समितियों को उनके बिजली उपभोग के आधार पर बिल जारी किए गए हैं और उन्होंने 2016 में एक समझौते पर सहमति दी थी। राज्य सरकार ने भी दलील दी कि समितियां व्यक्तिगत उपभोग की सीमा से अधिक बिजली का उपयोग कर रही हैं, जिसके कारण उन्हें सब्सिडी नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि सहकारी समितियों का गठन अनुचित वर्गीकरण का आधार नहीं हो सकता और यह असमानता को दर्शाता है। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार करे और किसान सहकारी समितियों को भी बिजली सब्सिडी का लाभ सुनिश्चित करे। यह फैसला सहकारी क्षेत्र में कार्यरत किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है, जो सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहन देगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा।


