-प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने बनायी अधिक से अधिक युवाओं को सहकारी क्षेत्र में लाने की रणनीति
-इंटरनेशनल कोऑपरेटिव अलायांस के ‘पांच ई मॉडल’ एजुकेशन, इम्प्लॉयमेंट, इक्वेलिटीज, इंगेजमेंट और एंटरप्रेन्योरशिप पर होगा काम
-युवाओं में जागरूकता बढ़ाना, सहकारी समितियों द्वारा आधुनिकीकरण एवं नवाचार अपनाना, युवाओं का प्रतिनिधित्व एवं नेतृत्व बढ़ाने के होंगे उपाय
नीतिगत मसलों पर व्यापक कदम उठाने के बाद सरकार अब सहकारी क्षेत्र में बड़े बदलाव पर ध्यान केंद्रित करने जा रही है। सरकार का इरादा सहकारी क्षेत्र में कार्यरत मानव संसाधन को वर्तमान जरूरतों के मुताबिक तैयार करने का है। इसके लिए सरकार ने युवाओं पर फोकस करने का निर्णय किया है। अगले पांच साल में सहकारी क्षेत्र में युवाओं की भागीदारी को 30 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है। अभी यह भागीदारी केवल 10 प्रतिशत की है। ऐसा होने से सहकारी समितियां न केवल अपने पारंपरिक ढांचे को तोड़कर अर्थव्यवस्था की मौजूदा जरूरतों के मुताबिक काम करने की स्थिति में आएंगी बल्कि डिजिटल दौर में वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उभर रही चुनौतियों का सामना भी कर पाएंगी।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की तरफ से तैयार एक नोट के मुताबिक सहकारिता को देश के विकास की धुरी बनाने के लिए इसमें युवाओं की भागीदारी को बढ़ाना बेहद आवश्यक है। इसके लिए कोऑपरेटिव सेक्टर में बड़े बदलाव करना अनिवार्य है। सरकार को सौंपे इस नोट में परिषद ने सुझाव दिया है कि युवाओं की भागीदारी को बढ़ाने के साथ साथ युवा नेतृत्व वाली 5000 से अधिक नई कोऑपरेटिव्स की स्थापना करने की भी आवश्यकता है। परिषद का मानना है कि 10 लाख से ज्यादा रोजगार और स्वरोजगार के अवसर सृजित करना जरूरी होगा। इतना ही नहीं 60 प्रतिशत शिक्षित युवाओं में कोऑपरेटिव के बारे में जागरूकता पैदा करना और 500 से ज्यादा ऑनलाइन कोऑपरेटिव स्थापित करने पर भी फोकस होना चाहिए। परिषद के इन सुझावों पर काम होता है तो सहकारी क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका में आ जाएगी। केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह के मुताबिक सरकार देश की जीडीपी में सहकारिता क्षेत्र के योगदान को 30 प्रतिशत तक पहुंचाना चाहती है।
सहकारिता के माध्यम से युवाओं का भविष्य संवारने और उनके लिए रोजगार एवं स्वरोजगार के नए-नए अवसर पैदा करने के लिए केंद्र सरकार निरंतर प्रयास कर रही है। अभी तक देश में सहकारिता का इस्तेमाल केवल व्यक्तिगत अथवा बेहद छोटे समूहों के उत्थान के लिए किया जाता रहा था, लेकिन मौजूदा सरकार ने इसके लिए एक व्यापक विस्तार का मसौदा तैयार किया है। इस बाबत न सिर्फ रोजगारन्मुखी नीतियां बनाई जा रही हैं, बल्कि नए-नए क्षेत्रों में संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं। सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बाद सहकारिता क्षेत्र युवाओं को रोजगार मुहैया कराने का एक बड़ा माध्यम है। हालांकि, सहकारी क्षेत्र में अभी युवाओं की काफी कमी है और ज्यादातर युवा इस क्षेत्र को अपने करियर के रूप में नहीं देखते हैं। खासकर, सहकारी समितियों में नेतृत्व स्तर पर युवाओं का प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर है। केंद्रीय सहकारिता मंत्रालय ने सहकारिता क्षेत्र में व्यापक सुधार के लिए कई पहल की है और युवाओं को इससे जोड़ने के लिए नई राष्ट्रीय सहकारिता नीति में प्रावधान किए गए हैं। देश में पहली बार त्रिभुवन सहकारी यूनिवर्सिटी की स्थापना की गई है जिसके माध्यम से युवाओं को कोऑपरेटिव की शिक्षा एवं प्रशिक्षण को मजबूती मिलेगी। यह यूनिवर्सिटी सहकारी क्षेत्र में कुशल पेशेवरों की कमी को पूरा करेगी। श्री शाह का मानना है कि त्रिभुवन सहकारी यूनिवर्सिटी सहकारी क्षेत्र के लिए युवा प्रोफेशनल्स तैयार कर सहकारी क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी।
सरकार की राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 के छह स्तंभों में युवाओं को सहकारिता से जोड़ने और सहकारिता के माध्यम से उनका भविष्य संवारने के उपाय किए गए हैं। इसके तहत यह प्रावधान किया गया है कि इस बात की संपूर्ण समीक्षा की जाए कि युवाओं को आगे बढ़ाने के क्या उपाय किए गए हैं, कोऑपरेटिव्स की लीडरशिप में उनकी कितनी भूमिका है, सहकारी संस्थाओं के निदेशक मंडल में उनके साथ किस तरह का व्यवहार किया जाता है, बोर्ड में शामिल युवा निदेशकों का गवर्नेंस कैसा है, उनके लिए जिम्मेदारी तय की जाती है या नहीं। इस तरह की समीक्षा नहीं की जाएगी तो न तो यह क्षेत्र आगे बढ़ पाएगा और न ही युवाओं को ज्यादा अवसर मिलेंगे।
भारत युवाओं का देश है। अगर कोऑपरेटिव्स युवाओं को आकर्षित नहीं कर पाएंगे तो देश में रोजगार उपलब्ध कराने के लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकेगा। सरकार मानती है कि युवाओं को आकर्षित करने के लिए केवल कोऑपरेटिव्स को बढ़ावा नहीं देना है, बल्कि कोऑपरेटिव एजुकेशन और ट्रेनिंग के माध्यम से युवाओं का भविष्य भी संवारना है।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य और संयुक्त सचिव डॉ. कमल कुमार त्रिपाठी ने युवा सहकार से कहा, ‘यह कोऑपरेटिव सेक्टर के लिए बहुत नाजुक समय है। आज युवाओं में सहकार की भावना तो है, लेकिन वे सहकारिता क्षेत्र से दूर चले गए हैं। उनको सहकारी सिद्धांतों के माध्यम से इस क्षेत्र में लाना पड़ेगा। इसके लिए उन्हें समझाना और जागरूक करना होगा कि आखिर यह है क्या और इस क्षेत्र में वे अपना करियर कैसे बना सकते हैं? एजुकेशन और ट्रेनिंग के माध्यम से ही इस क्षेत्र के लिए ज्यादा से ज्यादा कुशल पेशेवरों को तैयार किया जा सकता है। सहकारिता राज्य का विषय है। राज्यों को भी इसे बढ़ावा देने के लिए काफी सुधार और मेहनत करने की जरूरत है। उदाहरण के तौर पर देखें तो कई राज्यों में नया कोऑपरेटिव्स बनाने के लिए मेंबर्स की संख्या 50 तक होना जरूरी है। जम्मू-कश्मीर में तो 100 सदस्यों की अनिवार्यता है। इसी तरह, ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की सुविधा सभी राज्यों में नहीं है, जबकि अब हम डिजिटल दौर में जी रहे हैं। इस तरह के कई प्रावधानों में राज्य स्तर पर बदलाव की जरूरत है। एजुकेशन एवं ट्रेनिंग और मानव संसाधन के लिए नीति बनाने, टेक्नोलॉजी को अपनाने जैसे उन्हें उपाय करने होंगे।’
कैसे मिलेगा लक्ष्य
सहकारिता क्षेत्र में युवाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए वैश्विक सहकारी संगठन इंटरनेशनल कोऑपरेटिव अलायांस (आईसीए) ने ‘पांच ई मॉडल’ को अपनाने की जरूरत पर जोर दिया है। ये हैं- एजुकेशन, इम्प्लॉयमेंट, इक्वालिटीज, इंगेजमेंट और एंटरप्रेन्योरशिप।
शिक्षाः युवाओं को सहकारिता क्षेत्र से जोड़ने के लिए सबसे पहले सहकारी शिक्षा को बढ़ावा देने की जरूरत है। इसी को ध्यान में रखते हुए त्रिभुवन सहकारी यूनिवर्सिटी की स्थापना की गई है। यूनिवर्सिटी का पूरा फोकस सहकारी उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने, सहकारी क्षेत्र के लिए कुशल पेशेवर तैयार करने के साथ-साथ स्कूल और कॉलेज स्तर पर इसकी पढ़ाई को लेकर सुझाव देने और नीतियां बनाने पर है। इस यूनिवर्सिटी से सहकारी क्षेत्र के लिए युवा एवं योग्य श्रमबल की स्थायी और पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित होगी और कौशल संबंधी पाठ्यक्रमों के संचालन के लिए मौजूदा कौशल विकास केंद्रों एवं संस्थानों के साथ तालमेल स्थापित होगा। साथ ही सहकारी क्षेत्र की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पाठ्यक्रम व अध्ययन सूची तैयार करने के साथ-साथ अनुसंधान और विकास का संचालन भी यही यूनिवर्सिटी करेगी। परिषद ने सुझाव दिया है कि सहकारिता को एक विषय के रूप में स्कूली पाठ्यक्रमों में भी शामिल किया जाए। बीए, बीकॉम, एग्रीकल्चर, रिसर्च एवं डेवलपमेंट, पर्यावरण विज्ञान पाठ्यक्रम आदि में इसे वैकल्पिक विषय के रूप में अपनाया जाए। यूपीएससी एवं राज्यों की प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षाओं में सहकारिता को भी एक विषय के रूप में शामिल किया जाए। सहकारिता क्षेत्र की जरूरत के मुताबिक पाठ्यक्रम तैयार किए जाएं। सहकारिता को पाठ्यक्रमों में शामिल किए जाने के अलावा स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में कोऑपरेटिव स्टोर, कोऑपरेटिव कैंटीन एवं क्रेडिट सोसायटी बनाई जाए। इससे छात्र न सिर्फ इस क्षेत्र के काम करने के तरीको को बेहतर समझ पाएंगे, बल्कि उनमें सहकार की भावना भी मजबूत होगी।
रोजगारः कोऑपरेटिव के इस व्यापक लक्ष्य को पाने के लिए यह आवश्यक है कि शिक्षा के साथ रोजगारपरक नीतियां भी हों। उचित शिक्षा के बाद युवाओं को इस क्षेत्र में रोजगार नहीं मिलेगा तो वह इसे कभी भी करियर के रूप में नहीं अपनाएंगे। यही वजह है कि युवाओं के प्रशिक्षण को भी सरकार महत्वपूर्ण मानती है। टेक्नोलॉजी के साथ साथ युवाओं को नौकरी सुरक्षित करने और फाइनेंस एवं टैक्स का प्रबंधन करने का प्रशिक्षण भी देना जरूरी है। मैनेजमेंट, मार्केटिंग, फाइनेंस, बैंकिंग कोऑपरेटिव में काम करने के लिए तकनीकी दक्षता की जरूरत पड़ती है। परिषद ने सुझाव दिया है कि जहां सामाजिक सुरक्षा कमजोर है, वहां सहायता प्रणाली प्रदान की जाए। रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए नए कौशल और नई उद्यम गतिविधियों का विकास किया जाए और साझा स्वामित्व एवं सामूहिक सौदेबाजी के विभिन्न रूपों वाले कामगार तैयार किए जाएं। रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए इंटरप्रेन्योरशिप को बढ़ावा देने, कोऑपरेटिव इनक्यूबेटर की संख्या बढ़ाने, इनोवेटिव इंटरप्रेन्योरशिप की पूंजी तक पहुंच बढ़ाने, उन्हें सहयोगात्मक कानूनी ढांचा मुहैया कराने, समुदाय में व्यापार करने में आसानी हो इसके लिए सहयोग देने जैसे सुझाव दिए गए हैं।
अन्य उपायः युवाओं को कोऑपरेटिव से जोड़ने के लिए सहकारी युवा ब्रांड तैयार करने और उन ब्रांडों के साथ युवाओं का जुड़ाव बनाने की भी जरूरत महसूस की गई है। साथ ही युवाओं का नेटवर्क तैयार करने, उनमें स्वामित्व की भावना पैदा करने, उन्हें महत्वपूर्ण नवाचार उपलब्ध कराने, युवा ऊर्जा और अनुभवी एवं प्रतिबद्ध भावी नेताओं का समूह तैयार करने पर भी जोर दिया गया है।
युवा कैसे होंगे आकर्षित
जागरूकता बढ़ानाः युवाओं को सहकारी समितियों की ओर आकर्षित करने के लिए शिक्षा के साथ-साथ उनमें जागरूकता बढ़ाने की सबसे ज्यादा जरूरत है। इसके लिए युवा केंद्रित अभियानों का आयोजन किया जाए। युवा सहकारी नेताओं की सफलता की कहानियों को उजागर करने के लिए सोशल मीडिया, प्रभावशाली व्यक्तियों और कहानी सुनाने के साधनों का उपयोग किया जाए। “यूथ कोऑपरेटिव एम्बेस्डर” कार्यक्रम बनाएं जाएं और सहकारिता के प्रति जागरूकता एवं रुचि बढ़ाने के लिए इससे जुड़े लोग अपने आसपास के लोगों को प्रेरित करें।
आधुनिकीकरण और नवाचार अपनानाः सहकारी समितियों के आधुनिकीकरण, उनके द्वारा नवाचार अपनाए जाने और डिजिटल सहकारी समितियों को बढ़ावा देने से भी युवा इस ओर आकर्षित होंगे। आईटी, ई-कॉमर्स, नवीकरणीय ऊर्जा या रचनात्मक उद्योगों में युवा नेतृत्व वाले सहकारी संगठनों को प्रोत्साहित करना भी इसके लिए जरूरी है। आज की डिजिटल दुनिया में डिजिटल टूल्स को अपनाए बगैर युवाओं को आकर्षित करना मुश्किल है। आज की युवा पीढ़ी को हर चीज ऑनलाइन चाहिए। उनकी इस जरूरत को ध्यान में रखते हुए सहकारी समितियां ऑनलाइन सदस्यता प्रणाली, मोबाइल ऐप और ई-गवर्नेंस को अपना कर ज्यादा से ज्यादा युवाओं को अपने साथ जोड़ सकती हैं। कोऑपरेटिव बिजनेस मॉडल पर केंद्रित इनक्यूबेटर और एक्सीलरेटर प्रोग्राम के माध्यम से युवाओं के नवाचार को बढ़ावा दिया जा सकता है।
फाइनेंस एवं सपोर्ट सिस्टम तक पहुंचः इसके तहत युवा केंद्रित सहकारी ऋण योजनाएं शुरू करने की जरूरत है ताकि युवा नेतृत्व वाली सहकारी समितियों को स्टार्टअप अनुदान या कम ब्याज दर पर कर्ज उपलब्ध करवाया जा सके। युवा उद्यमियों का मार्गदर्शन करने के लिए पहले से स्थापित सहकारी समितियां व्यवसाय सलाहकारों के साथ साझेदारी करें ताकि उन्हें परामर्श एवं प्रशिक्षण दिया जा सके। युवा सहकारी समिति शुरू करने के लिए रजिस्ट्रेशन प्रोसेस को आसान और तेज बनाने का भी सुझाव सलाहकार परिषद ने दिया है।
प्रतिनिधित्व और नेतृत्वः कोऑपरेटिव सोसायटीज के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स, कोऑपरेटिव यूनियन एवं फेडरेशन में युवा प्रतिनिधियों की भागादीरी बढ़ाने के लिए युवाओं की सीट आरक्षित की जाए। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने सुझाव दिया है कि कोऑपरेटिव यूनियनों में अलग से यूथ विंग की स्थापना की जाए ताकि यूनियनों में युवाओं का इंगेजमेंट बढ़े और उन्हें लीडरशिप ट्रेनिंग मिल सके।
सामाजिक और पर्यावरणीय फोकसः युवाओं को आकर्षित करने के सुझावों में सहकारी समितियों को युवा मूल्यों के साथ तालमेल बिठाने की भी वकालत की गई है। उन्हें स्थिरता, समावेशिता और सामुदायिक प्रभाव के मुद्दों पर जोर देने का सुझाव दिया गया है जो युवा पीढ़ी को जोड़ने में मददगार साबित हो सकता है। सामाजिक नवाचार को बढ़ावा देने कि लिए सहकारी समितियों को स्वच्छ ऊर्जा, चक्रीय अर्थव्यवस्था या लैंगिक समानता जैसे सतत विकास लक्ष्यों से निपटना जरूरी है।
कोऑपरेटिव के माध्यम से विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए भी ज्यादा से ज्यादा युवाओं को कोऑपरेटिव सेक्टर से जोड़ना जरूरी है। युवा न सिर्फ ऊर्जा से भरपूर होते हैं, बल्कि उनके पास नए विचार, आधुनिक एवं नया कौशल, डिजिटल कौशल होता है और एंटरप्रेन्योरशिप को लेकर जोश एवं उत्साह भरा रहता है जो किसी भी कोऑपरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है। साथ ही ये सहकारी समितियों की पीढ़ीगत निरंतरता को सुनिश्चित करते हैं। स्थानीय चुनौतियों से निपटने, जलवायु परिवर्तन, डिजिटल समावेशन और सामाजिक उद्यमिता को बढ़ावा देने में भी ये मददगार हैं। जोखिम लेने से घबराना नहीं और अनिश्चितताओं के प्रति उनका अलग दृष्टिकोण रखना भी एक महत्वपूर्ण कारक जिसकी वजह से उन्हें कोऑपरेटिव से जोड़ना देश के विकास के लिए लाभदायक साबित होगा।


