महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर के ग्रामीण क्षेत्रों, विशेष रूप से करमाड और हिवरा जैसे गांवों में किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) ने महिलाओं के जीवन को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाया है। पहले खेतों में मजदूरी कर प्रतिदिन 200-300 रुपये कमाने वाली महिलाएं अब मक्का और प्याज प्रसंस्करण इकाइयों में कार्यरत हैं, जहां वे प्रतिदिन 2,000 रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं। यह बदलाव न केवल उनकी वित्तीय स्थिति को मजबूत कर रहा है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे रहा है।
करमाड में स्थापित मक्का प्रसंस्करण इकाई में कार्यरत पद्मजा वेदपाठक ने बताया कि वे सप्ताह में सातों दिन काम करती हैं और प्रतिदिन लगभग तीन टन मक्का का प्रसंस्करण कर 2,000 रुपये कमाती हैं। पहले खेतों में कड़ी मेहनत के बाद उन्हें मात्र 300 रुपये मिलते थे। एफपीओ सदस्य प्रभावती पडुल ने बताया कि उनका संगठन, जो 2020 में स्थापित हुआ, बाजार से मक्का 18 रुपये प्रति किलो की दर से खरीदता है और उसे पोल्ट्री फीड, तेल और खाद्य उत्पादों के लिए संसाधित कर 25-26 रुपये प्रति किलो बेचता है, जिससे प्रति किलो 7 रुपये का मुनाफा होता है। ये इकाइयां होटलों और खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों को उत्पादों की आपूर्ति कर रही हैं।
हिवरा गांव में सौर ऊर्जा से संचालित प्याज सुखाने की इकाई ने भी महिलाओं को रोजगार के नए अवसर प्रदान किए हैं। यहां कार्यरत रेखा पोफले ने बताया कि वे प्रतिदिन 500 रुपये कमाती हैं, जिससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है। उन्होंने कर्ज चुकाने, बचत करने और बच्चों की शिक्षा के लिए अंग्रेजी माध्यम स्कूल में दाखिला कराने जैसे कार्य किए।
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के जिला विकास प्रबंधक सुरेश पटवेकर ने बताया कि नाबार्ड ने जिले में महिलाओं के लिए एफपीओ स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्तमान में 1,500 से अधिक महिलाएं इन संगठनों से जुड़ी हैं, जो टमाटर, प्याज, अदरक और मक्का जैसे उत्पादों का प्रसंस्करण कर रही हैं। नाबार्ड प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बाजार पहुंच प्रदान करता है। महात्मा फुले एकात्मिक समाज मंडल के सतत विकास प्रमुख कैलाश राठौड़ ने बताया कि उनकी संस्था ने जल संरक्षण से शुरूआत कर एफपीओ की स्थापना की, जिसके तहत महाराष्ट्र में 32 एफपीओ कार्यरत हैं और 10,000 से अधिक किसान इनसे जुड़े हैं।
छत्रपति संभाजीनगर के तीन एफपीओ का वार्षिक कारोबार 2020 में 7-8 करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 74 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह उपलब्धि ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण और एफपीओ के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सकारात्मक बदलाव का प्रतीक है। सरकार, नाबार्ड और सामाजिक संगठनों के सहयोग से यह मॉडल अन्य क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है।


