बिहार में मछली पालन का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। बीते 10 वर्षों में राज्य का मछली उत्पादन लगभग दोगुना हो गया है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिली है। सरकारी योजनाओं, वैज्ञानिक तकनीकों और जल संसाधनों के बेहतर उपयोग ने इस क्षेत्र को किसानों और उद्यमियों के लिए आय का अहम स्रोत बना दिया है।
10 साल में दोगुना उत्पादन
कृषि एवं मत्स्य विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2014-15 में बिहार का कुल मछली उत्पादन 4.80 लाख टन था, जो 2023-24 में बढ़कर 8.73 लाख टन तक पहुंच गया।
2015-16 में उत्पादन 5.07 लाख टन रहा, जबकि 2016-17 में मामूली गिरावट के साथ यह 5.00 लाख टन पर आ गया। इसके बाद राज्य ने लगातार प्रगति दर्ज की। 2017-18 में उत्पादन 5.88 लाख टन, 2018-19 में 6.02 लाख टन और 2019-20 में 6.41 लाख टन रहा।
कोरोना काल के बावजूद 2020-21 में उत्पादन 6.83 लाख टन तक पहुंचा। इसके बाद तेजी से बढ़ते हुए 2021-22 में 7.62 लाख टन, 2022-23 में 8.46 लाख टन और 2023-24 में 8.73 लाख टन का ऐतिहासिक स्तर छू लिया।
सरकारी योजनाओं का असर
मछली उत्पादन में उछाल के पीछे सरकार की ओर से चलाई जा रही प्रोत्साहन योजनाएं, तालाबों और जलाशयों का वैज्ञानिक उपयोग, गुणवत्तापूर्ण बीज और चारा की उपलब्धता तथा मत्स्य पालन को लघु उद्यम के रूप में बढ़ावा देने की नीतियां प्रमुख वजह मानी जा रही हैं।
प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल
गंगा, सोन, गंडक, कोसी जैसी नदियों और कई छोटे-बड़े जल स्रोतों ने राज्य को प्राकृतिक बढ़त दी है। इनके साथ-साथ निजी तालाबों, सरकारी जलाशयों और सामुदायिक मत्स्य परियोजनाओं के विस्तार ने उत्पादन बढ़ाने में निर्णायक भूमिका निभाई है।


