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मत्स्य पालन में नई क्रांति: खारे पानी की खेती बनेगी आजीविका का मजबूत स्तंभ

भारत पहले से ही विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कल्चर्ड झींगा उत्पादक देश है और इसके समुद्री निर्यात मूल्य का 65% से अधिक हिस्सा झींगे से आता है। ऐसे में खारे जल क्षेत्रों का सही उपयोग न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है, बल्कि देश के निर्यात को भी बढ़ा सकता है।

यह पहल ना सिर्फ खारे जल क्षेत्रों के पुनः उपयोग का रास्ता खोलेगी, बल्कि ग्रामीण भारत के लिए रोजगार और आय का नया द्वार भी बनेगी।


Published: 14:12pm, 08 Apr 2025

देश के खारे जल क्षेत्रों को बंजर भूमि से समृद्धि के स्रोत में बदलने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक अहम पहल की है। केंद्रीय मत्स्य पालन विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने हाल ही में मुंबई स्थित आईसीएआर-सीआईएफई (केंद्रीय मात्स्यिकी शिक्षा संस्थान) का दौरा किया और हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व उत्तर प्रदेश में खारे पानी में झींगा पालन की संभावनाओं और चुनौतियों पर गहन समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य खारे जल क्षेत्रों को रोजगार और आजीविका के प्रभावी स्रोत में बदलने की दिशा में ठोस कदम उठाना था।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित इस बैठक में चारों राज्यों के मत्स्य पालन अधिकारी और किसान शामिल हुए। डॉ. लिखी ने किसानों से सीधे संवाद कर जमीनी स्तर पर आ रही समस्याओं और सुझावों को समझा। उन्होंने आईसीएआर-सीआईएफई की जलकृषि और सजावटी मछली इकाई का दौरा भी किया, जिससे खारे जल के बेहतर उपयोग के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मजबूती मिल सके।

राज्यों में मौजूदा हालात

उत्तर प्रदेश में करीब 1.37 लाख हेक्टेयर इनलैंड साल्ट-अफेक्टेड भूमि है, खासकर मथुरा, आगरा, हाथरस और रायबरेली जिलों में। इन इलाकों में पीएम मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत झींगा पालन को बढ़ावा देने के प्रयास हो रहे हैं।

राजस्थान के चूरू और गंगानगर जिलों में झींगा, मिल्कफिश और पर्ल स्पॉट की खेती को तेजी मिली है। लगभग 500 हेक्टेयर में जलीय कृषि की जा रही है और चूरू में एक उन्नत डायग्नोस्टिक लैब की स्थापना भी की गई है।

पंजाब के मुक्तसर साहिब और फाजिल्का जैसे दक्षिण-पश्चिमी जिलों में झींगा पालन को केंद्र और राज्य की योजनाओं का बल मिला है। राज्य में 30 टन क्षमता वाला कोल्ड स्टोरेज, आइस प्लांट और प्रशिक्षण केंद्र भी बनाया गया है

हरियाणा ने खारे जल में जलकृषि से 13,914 टन उत्पादन और 57.09 करोड़ रुपये का निवेश कर उल्लेखनीय प्रगति की है, जिससे यह राज्य एक उदाहरण बनकर उभरा है।

विशाल संभावनाएं, सीमित उपयोग

देश में अब तक 58 हजार हेक्टेयर खारी भूमि की पहचान की जा चुकी है, लेकिन इसका केवल 2,608 हेक्टेयर हिस्सा ही जलीय कृषि के तहत उपयोग हो रहा है। ऐसे में इस क्षेत्र में विकास की विशाल संभावनाएं हैं। भारत पहले से ही दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कल्चर्ड झींगा उत्पादक देश है और समुद्री उत्पादों के निर्यात का 65% मूल्य झींगे से आता है।

किसानों की प्रमुख चुनौतियाँ

बैठक में किसानों ने कई अहम समस्याएं सामने रखीं। इनमें उच्च स्थापना लागत, सीमित सब्सिडी कवरेज और खारे पानी की खेती के लिए अधिकतम 2 हेक्टेयर क्षेत्र की सीमा सबसे बड़ी बाधाएं रहीं। इसके अलावा लवणता के स्तर में अस्थिरता, उच्च भूमि पट्टे की दरें, गुणवत्ता वाले बीज की कमी, और विपणन व कोल्ड स्टोरेज जैसी आधारभूत सुविधाओं की अनुपलब्धता भी जलीय कृषि की प्रगति में रोड़े अटका रही हैं।

समाधान और सुझाव

राज्यों ने क्षेत्र को मजबूत करने के लिए केंद्र से कुछ अहम मांगें रखी हैं। इनमें झींगा पालन इकाइयों की लागत सीमा को बढ़ाकर ₹25 लाख करना, क्षेत्र सीमा को 2 हेक्टेयर से बढ़ाकर 5 हेक्टेयर करना, पॉलीथीन लाइनिंग पर सब्सिडी में इजाफा और सिरसा में एक एकीकृत एक्वा पार्क की स्थापना शामिल है। इसके साथ ही बेहतर मार्केटिंग चैनल और मूल्य निर्धारण प्रणाली विकसित करने की सिफारिश की गई है।

डॉ. लिखी ने राज्यों, ICAR और अन्य एजेंसियों के साथ मिलकर समन्वित रणनीति तैयार करने पर बल दिया, जिससे खारी भूमि का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित हो सके। इसके लिए व्यापक जागरूकता अभियानों के संचालन की योजना भी बनाई गई है।

YuvaSahakar Desk

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