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अमेरिका नहीं, अब यूरोप बन रहा भारतीय छात्रों की पहली पसंद

विदेश में उच्च शिक्षा के लिए भारतीय छात्रों की पसंद तेजी से बदल रही है। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में बढ़ती फीस, सख्त वीजा नियम और अनिश्चित इमिग्रेशन नीतियों के कारण अब यूरोप प्रमुख विकल्प बन रहा है।

Lower Costs and Better Careers Draw Indian Students to Europe


Published: 15:46pm, 20 Jul 2026

विदेश में उच्च शिक्षा के लिए भारतीय छात्रों की पहली पसंद लंबे समय तक अमेरिका रहा, लेकिन अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है। कम ट्यूशन फीस, अपेक्षाकृत कम रहने का खर्च, पढ़ाई के बाद नौकरी के बेहतर अवसर और भारत-यूरोपीय संघ के बीच हुए नए समझौते के बाद बड़ी संख्या में भारतीय छात्र यूरोप का रुख कर रहे हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में लगभग 6.26 लाख भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेश गए, जबकि 2023 में यह संख्या 9.08 लाख से अधिक थी। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में बढ़ती फीस, सख्त वीजा नियम और अनिश्चित आव्रजन नीतियों के कारण छात्र अब नए विकल्प तलाश रहे हैं।

शिक्षा परामर्श विशेषज्ञों के अनुसार, कई यूरोपीय देशों में ट्यूशन फीस अमेरिका की तुलना में 50% से 80% तक कम है। इसके अलावा जीवन-यापन का खर्च भी कम है, जिससे मध्यमवर्गीय भारतीय परिवारों के लिए यूरोप अधिक किफायती बन गया है। अंग्रेजी माध्यम में उपलब्ध मास्टर्स कार्यक्रम, पढ़ाई के बाद काम करने के अवसर और यूरोप के विभिन्न देशों में आसान आवाजाही भी छात्रों को आकर्षित कर रही है।

वर्तमान में यूरोपीय संघ के देशों में 1.21 लाख से अधिक भारतीय छात्र अध्ययन कर रहे हैं। हालांकि यह संख्या अभी भी अमेरिका में पढ़ रहे भारतीय छात्रों से कम है, लेकिन इसमें लगातार वृद्धि हो रही है। नीदरलैंड में भारतीय छात्रों की संख्या 2018-19 के 2,630 से बढ़कर 2025-26 में करीब 3,700 हो गई है। वहीं Eindhoven University of Technology में भारतीय छात्रों के प्री-एनरोलमेंट 1,390 से बढ़कर 2,140 तक पहुंच गए हैं। Leiden University में भारतीय छात्रों का मास्टर्स प्रवेश 2021 के 70 से बढ़कर इस वर्ष 120 हो गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार, अब छात्र केवल किसी देश की लोकप्रियता नहीं बल्कि अपने करियर के अनुसार गंतव्य चुन रहे हैं। इंजीनियरिंग के लिए जर्मनी, मैनेजमेंट के लिए फ्रांस, बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस के लिए नीदरलैंड और किफायती शोध कार्यक्रमों के लिए पुर्तगाल तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि केवल डिग्री मिलने से नौकरी की गारंटी नहीं होती। रोजगार के लिए आवश्यक कौशल विकसित करना उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद संकेत साफ हैं कि यदि भारत-ईयू समझौता प्रभावी ढंग से लागू हुआ, तो अगले 3 से 5 वर्षों में भारतीय छात्रों और कुशल पेशेवरों की यूरोप में आवाजाही 60% से 70% तक बढ़ सकती है।

Jitendra