संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सहकारिताओं की भूमिका को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। महासभा ने औपचारिक रूप से यह स्वीकार किया है कि सहकारिताएं समावेशी आर्थिक और सामाजिक विकास में लंबे समय से अहम और परिवर्तनकारी भूमिका निभाती आ रही हैं। इसी के साथ यह निर्णय भी लिया गया है कि अब हर दस साल में एक अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष घोषित किया जाएगा।
यह प्रस्ताव A/RES/80/182 – सामाजिक विकास में सहकारिताएं शीर्षक से 15 दिसंबर 2025 को अपनाया गया था और हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक दस्तावेज मंच पर प्रकाशित हुआ है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया असमानता, जलवायु संकट और सामाजिक विभाजन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने माना कि 2012 और 2025 में मनाए गए अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्षों का वैश्विक स्तर पर सकारात्मक असर देखने को मिला। इसी अनुभव के आधार पर अब यह तय किया गया है कि सरकारों, संस्थानों और समाज को सहकारिताओं को सतत विकास के प्रभावी माध्यम के रूप में अपनाने के लिए हर दशक में एक अंतरराष्ट्रीय वर्ष समर्पित किया जाएगा।
प्रस्ताव में कहा गया है कि सहकारिताएं लोगों को आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों में अधिकतम भागीदारी का अवसर देती हैं। ये संस्थाएं गरीबी और भूख मिटाने, खाद्य सुरक्षा मजबूत करने, सामाजिक समावेशन बढ़ाने, लैंगिक समानता को प्रोत्साहित करने और रोजगार सृजन में प्रत्यक्ष योगदान देती हैं। साथ ही जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी सहकारिताओं की भूमिका को अहम माना गया है। लोकतांत्रिक स्वामित्व और समुदाय के हित को प्राथमिकता देने के कारण सहकारिताएं ऐसे विकास का मॉडल प्रस्तुत करती हैं जो समावेशी होने के साथ-साथ टिकाऊ भी है।
इस प्रस्ताव में सहकारी गतिविधियों को सीधे तौर पर संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों से जोड़ा गया है। इसमें आदिवासी समुदायों, ग्रामीण क्षेत्रों और अन्य कमजोर वर्गों के जीवन स्तर में सुधार लाने में सहकारिताओं की भूमिका को स्वीकार किया गया है। कृषि, वित्त, आवास और सामाजिक सेवाओं जैसे क्षेत्रों में सहकारिताएं जमीनी स्तर पर विकास की खाई को पाटने का काम कर रही हैं।
महासभा ने सदस्य देशों से यह भी आग्रह किया है कि वे सहकारिताओं के लिए अनुकूल नीतिगत और संस्थागत माहौल तैयार करें। इसमें बेहतर कानूनी और नियामक ढांचा, पूंजी तक आसान पहुंच, निष्पक्ष कर व्यवस्था, कृषि और वित्तीय सहकारिताओं को समर्थन, डिजिटल कनेक्टिविटी का विस्तार, शोध और आंकड़ों को मजबूत करना तथा सहकारिताओं में महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व को बढ़ावा देना शामिल है।
इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस को हर वर्ष जुलाई के पहले शनिवार को मनाने की परंपरा को भी दोहराया गया है। वर्ष 2026 में अंतरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस 4 जुलाई को मनाया जाएगा, जिसकी थीम बाद में घोषित की जाएगी।
इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए इंटरनेशनल कोऑपरेटिव एलायंस के अध्यक्ष डॉ. एरियल गुआर्को ने कहा कि यह निर्णय ऐसे दौर में आया है जब दुनिया पर्यावरणीय संकट, बढ़ती असमानता और संस्थाओं में घटते भरोसे का सामना कर रही है। उन्होंने कहा कि सहकारिताएं यह साबित करती हैं कि बिना किसी को पीछे छोड़े संपत्ति का निर्माण और वितरण संभव है, साथ ही पर्यावरण और सामाजिक रिश्तों की भी रक्षा की जा सकती है।
आईसीए के महानिदेशक जेरोन डगलस ने इसे एक असाधारण मान्यता बताते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र बहुत कम ही किसी विषय को बार-बार अंतरराष्ट्रीय वर्ष के रूप में मान्यता देता है। उन्होंने इस पहल के लिए मंगोलिया सरकार की भूमिका को सराहा और कहा कि “Cooperatives build a better world” आज भी सहकारी आंदोलन के उद्देश्य को सटीक रूप से दर्शाता है।
यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र और सहकारी आंदोलन के बीच दशकों पुराने संबंधों को भी मजबूत करता है। 1950 के दशक से शुरू हुआ यह जुड़ाव 1992 के बाद से नियमित प्रस्तावों और 2023 में सामाजिक एवं एकजुटता अर्थव्यवस्था पर पहले प्रस्ताव के साथ और सशक्त हुआ है।
संयुक्त राष्ट्र का यह फैसला वैश्विक सहकारी आंदोलन के लिए एक नई ऊर्जा और दिशा देने वाला माना जा रहा है, जिससे सहकारिताएं आने वाले वर्षों में समावेशी और न्यायपूर्ण विकास की मजबूत धुरी बन सकेंगी।


