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RBI ने सहकारी बैंकों के लिए विदेशी मुद्रा और स्वर्ण जोखिम पर पूंजी मानदंडों में संशोधन का मसौदा जारी किया

आरबीआई के अनुसार इन संशोधित मानदंडों के लागू होने से सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में जोखिम संवेदनशीलता बढ़ेगी, पूंजी सुरक्षा मजबूत होगी और सहकारी बैंक व्यापक नियामकीय सर्वोत्तम प्रथाओं के अधिक अनुरूप बन सकेंगे

Published: 11:37am, 17 Jan 2026

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने शहरी सहकारी बैंकों (UCB) और ग्रामीण सहकारी बैंकों (RCB) के लिए विदेशी मुद्रा एवं सोने की कीमत से जुड़े जोखिमों पर पूंजी पर्याप्तता के विवेकपूर्ण मानदंडों में महत्वपूर्ण संशोधन प्रस्तावित करते हुए संशोधन दिशा-निर्देशों का मसौदा जारी किया है। इस पहल का उद्देश्य जोखिम प्रबंधन को सुदृढ़ करना और सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में नियामकीय मानकों का एकसमान एवं प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित करना है।

RBI ने ये मसौदा संशोधन दो अलग-अलग अधिसूचनाओं के माध्यम से जारी किए हैं—
भारतीय रिजर्व बैंक (शहरी सहकारी बैंक – पूंजी पर्याप्तता पर विवेकपूर्ण मानदंड) संशोधन निर्देश, 2026 और भारतीय रिजर्व बैंक (ग्रामीण सहकारी बैंक – पूंजी पर्याप्तता पर विवेकपूर्ण मानदंड) संशोधन निर्देश, 2026।

इन प्रस्तावों के तहत जोखिम प्रबंधन एवं अंतर-बैंक लेनदेन पर मास्टर दिशा-निर्देशों तथा सहकारी बैंकों पर लागू पूंजी पर्याप्तता दिशा-निर्देश, 2025 में संशोधन का प्रस्ताव किया गया है। आरबीआई के अनुसार इन बदलावों का उद्देश्य नेट ओपन पोजीशन (एनओपी) मानदंडों और विदेशी मुद्रा जोखिम पर पूंजी आवश्यकताओं का सहकारी बैंकिंग प्रणाली में सुसंगत और मजबूत कार्यान्वयन सुनिश्चित करना है। केंद्रीय बैंक ने कहा कि इन मानदंडों के अनुप्रयोग में असमानताओं के कारण स्पष्ट दिशा-निर्देश और बेहतर विवेकपूर्ण निगरानी आवश्यक हो गई थी, विशेषकर विदेशी मुद्रा और स्वर्ण से जुड़े बढ़ते जोखिमों को देखते हुए।

मसौदा दिशा-निर्देशों की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यूसीबी और आरसीबी को विदेशी मुद्रा जोखिम के लिए निरंतर आधार पर, यानी प्रत्येक कारोबारी दिन के अंत में, पूंजी बनाए रखना होगा। यह व्यवस्था पहले की आवधिक निगरानी की तुलना में अधिक गतिशील पूंजी प्रबंधन सुनिश्चित करेगी।

मसौदे में नेट ओपन पोजीशन की गणना के लिए एक मानकीकृत पद्धति भी निर्धारित की गई है, जिसमें स्पॉट पोजीशन, फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट, डेरिवेटिव एक्सपोजर और गोल्ड पोजीशन शामिल होंगी। हालांकि जो पोजीशन पहले ही नियामकीय पूंजी से घटाई जा चुकी हैं तथा गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के रूप में वर्गीकृत प्रतिभूतियाँ हैं, उन्हें विदेशी मुद्रा जोखिम पूंजी की गणना से बाहर रखा जाएगा। इससे जोखिम की दोहरी गणना से बचाव होगा और पूंजी आकलन अधिक सटीक होगा।

आरबीआई ने इन नियमों की लागू सीमा को भी स्पष्ट किया है। विदेशी मुद्रा जोखिम पूंजी मानदंड केवल अधिकृत डीलर (एडी) सहकारी बैंकों पर लागू होंगे। जो सहकारी बैंक अधिकृत डीलर नहीं हैं, उन्हें विदेशी मुद्रा जोखिम के लिए पूंजी बनाए रखने की आवश्यकता नहीं होगी, लेकिन उन्हें सोने से उत्पन्न शुद्ध खुली स्थितियों के लिए पूंजी की गणना कर उसे बनाए रखना होगा।

प्रस्तावित संशोधन हितधारकों से परामर्श के बाद अंतिम रूप दिए जाने पर 1 अप्रैल 2027 से प्रभावी होने की संभावना है। आरबीआई ने सहकारी बैंकों और उद्योग संगठनों सहित सभी हितधारकों से 3 फरवरी 2026 तक सुझाव और प्रतिक्रियाएं आमंत्रित की हैं।

आरबीआई के अनुसार इन संशोधित मानदंडों के लागू होने से सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में जोखिम संवेदनशीलता बढ़ेगी, पूंजी सुरक्षा मजबूत होगी और सहकारी बैंक व्यापक नियामकीय सर्वोत्तम प्रथाओं के अधिक अनुरूप बन सकेंगे।

Diksha